रात दिन चैन हम ऐ रश्क-ए-क़मर रखते हैं शाम अवध की तो बनारस की सहर रखते हैं भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं ढूँढ़ लेता मैं अगर और किसी जा होते क्या कहूँ आप दिल-ए-ग़ैर में घर रखते हैं अश्क क़ाबू में नहीं राज़ छुपाऊँ क्यूँँकर दुश्मनी मुझ से मिरे दीदा-ए-तर रखते हैं कैसे बे-रहम हैं सय्याद इलाही तौबा मौसम-ए-गुल में मुझे काट के पर रखते हैं कौन हैं हम से सिवा नाज़ उठाने वाले सामने आएँ जो दिल और जिगर रखते हैं दिल तो क्या चीज़ है पत्थर हो तो पानी हो जाए मेरे नाले अभी इतना तो असर रखते हैं चार दिन के लिए दुनिया में लड़ाई कैसी वो भी क्या लोग हैं आपस में शरर रखते हैं हाल-ए-दिल यार को महफ़िल में सुनाऊँ क्यूँँ कर मुद्दई कान उधर और इधर रखते हैं जल्वा-ए-यार किसी को नज़र आता कब है देखते हैं वही उस को जो नज़र रखते हैं आशिक़ों पर है दिखाने को इताब ऐ 'जौहर' दिल में महबूब इनायत की नज़र रखते हैं अश्क क़ाबू में नहीं राज़ छुपाऊँ क्यूँँकर दुश्मनी मुझ से मिरे दीदा-ए-तर रखते हैं कैसे बे-रहम हैं सय्याद इलाही तौबा मौसम-ए-गुल में मुझे काट के पर रखते हैं कौन हैं हम से सिवा नाज़ उठाने वाले सामने आएँ जो दिल और जिगर रखते हैं दिल तो क्या चीज़ है पत्थर हो तो पानी हो जाए मेरे नाले अभी इतना तो असर रखते हैं चार दिन के लिए दुनिया में लड़ाई कैसी वो भी क्या लोग हैं आपस में शरर रखते हैं हाल-ए-दिल यार को महफ़िल में सुनाऊँ क्यूँँ कर मुद्दई कान उधर और इधर रखते हैं जल्वा-ए-यार किसी को नज़र आता कब है देखते हैं वही उस को जो नज़र रखते हैं आशिक़ों पर है दिखाने को इताब ऐ 'जौहर' दिल में महबूब इनायत की नज़र रखते हैं
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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दिल मिरा ख़्वाब-गाह-ए-दिलबर है बस यही एक सोने का घर है ज़ुल्फ़ें मुँह पर हैं मुँह है ज़ुल्फ़ों में रात भर सुब्ह शाम दिन भर है चश्म-ए-इंसाफ़ से नज़ारा कर एक क़तरा यहाँ समुंदर है बहुत ईज़ा उठाई फ़ुर्क़त की अब नहीं इख़्तियार दिल पर है देख कर चाँद सा तुम्हारा मुँह आईना मेरी तरह शश्दर है दिल मिलाऊँ मैं क्या तिरे दिल से एक शीशा है एक पत्थर है
Lala Madhav Ram Jauhar
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क्या याद कर के रोऊँ कि कैसा शबाब था कुछ भी न था हवा थी कहानी थी ख़्वाब था अब इत्र भी मलो तो तकल्लुफ़ की बू कहाँ वो दिन हवा हुए जो पसीना गुलाब था महमिल-नशीं जब आप थे लैला के भेस में मजनूँ के भेस में कोई ख़ाना-ख़राब था तेरा क़ुसूर-वार ख़ुदा का गुनाहगार जो कुछ कि था यही दिल-ए-ख़ाना-ख़राब था ज़र्रा समझ के यूँँ न मिला मुझ को ख़ाक में ऐ आसमान मैं भी कभी आफ़्ताब था
Lala Madhav Ram Jauhar
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तेरे कूचे की हुआ लग गई शायद उस को रोज़ बे-पर की उड़ाता है कबूतर हम से हम सुलैमान बनेंगे जो परी होगे तुम होश में आओ कहाँ जाओगे उड़ कर हम से गालियाँ कौन सुने जब न रहा कुछ मतलब आज से कीजिएगा बात समझ कर हम से हम किसी और को ताकेंगे तुम्हारे होते क्या कहा फिर तो कहो आँख मिला कर हम से आप हो जाएँगे सीधे कहीं दिन हों सीधे वो भी टेढ़े हैं जो टेढ़ा है मुक़द्दर हम से वो भी क्या दिन थे कि जब रहती थीं नीची नज़रें चार आँखें जो हुईं फिर गए तेवर हम से
Lala Madhav Ram Jauhar
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