क्या याद कर के रोऊँ कि कैसा शबाब था कुछ भी न था हवा थी कहानी थी ख़्वाब था अब इत्र भी मलो तो तकल्लुफ़ की बू कहाँ वो दिन हवा हुए जो पसीना गुलाब था महमिल-नशीं जब आप थे लैला के भेस में मजनूँ के भेस में कोई ख़ाना-ख़राब था तेरा क़ुसूर-वार ख़ुदा का गुनाहगार जो कुछ कि था यही दिल-ए-ख़ाना-ख़राब था ज़र्रा समझ के यूँँ न मिला मुझ को ख़ाक में ऐ आसमान मैं भी कभी आफ़्ताब था
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे
Jaun Elia
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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
Tehzeeb Hafi
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बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है
Tehzeeb Hafi
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दिल मिरा ख़्वाब-गाह-ए-दिलबर है बस यही एक सोने का घर है ज़ुल्फ़ें मुँह पर हैं मुँह है ज़ुल्फ़ों में रात भर सुब्ह शाम दिन भर है चश्म-ए-इंसाफ़ से नज़ारा कर एक क़तरा यहाँ समुंदर है बहुत ईज़ा उठाई फ़ुर्क़त की अब नहीं इख़्तियार दिल पर है देख कर चाँद सा तुम्हारा मुँह आईना मेरी तरह शश्दर है दिल मिलाऊँ मैं क्या तिरे दिल से एक शीशा है एक पत्थर है
Lala Madhav Ram Jauhar
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रात दिन चैन हम ऐ रश्क-ए-क़मर रखते हैं शाम अवध की तो बनारस की सहर रखते हैं भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं ढूँढ़ लेता मैं अगर और किसी जा होते क्या कहूँ आप दिल-ए-ग़ैर में घर रखते हैं अश्क क़ाबू में नहीं राज़ छुपाऊँ क्यूँँकर दुश्मनी मुझ से मिरे दीदा-ए-तर रखते हैं कैसे बे-रहम हैं सय्याद इलाही तौबा मौसम-ए-गुल में मुझे काट के पर रखते हैं कौन हैं हम से सिवा नाज़ उठाने वाले सामने आएँ जो दिल और जिगर रखते हैं दिल तो क्या चीज़ है पत्थर हो तो पानी हो जाए मेरे नाले अभी इतना तो असर रखते हैं चार दिन के लिए दुनिया में लड़ाई कैसी वो भी क्या लोग हैं आपस में शरर रखते हैं हाल-ए-दिल यार को महफ़िल में सुनाऊँ क्यूँँ कर मुद्दई कान उधर और इधर रखते हैं जल्वा-ए-यार किसी को नज़र आता कब है देखते हैं वही उस को जो नज़र रखते हैं आशिक़ों पर है दिखाने को इताब ऐ 'जौहर' दिल में महबूब इनायत की नज़र रखते हैं अश्क क़ाबू में नहीं राज़ छुपाऊँ क्यूँँकर दुश्मनी मुझ से मिरे दीदा-ए-तर रखते हैं कैसे बे-रहम हैं सय्याद इलाही तौबा मौसम-ए-गुल में मुझे काट के पर रखते हैं कौन हैं हम से सिवा नाज़ उठाने वाले सामने आएँ जो दिल और जिगर रखते हैं दिल तो क्या चीज़ है पत्थर हो तो पानी हो जाए मेरे नाले अभी इतना तो असर रखते हैं चार दिन के लिए दुनिया में लड़ाई कैसी वो भी क्या लोग हैं आपस में शरर रखते हैं हाल-ए-दिल यार को महफ़िल में सुनाऊँ क्यूँँ कर मुद्दई कान उधर और इधर रखते हैं जल्वा-ए-यार किसी को नज़र आता कब है देखते हैं वही उस को जो नज़र रखते हैं आशिक़ों पर है दिखाने को इताब ऐ 'जौहर' दिल में महबूब इनायत की नज़र रखते हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
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तेरे कूचे की हुआ लग गई शायद उस को रोज़ बे-पर की उड़ाता है कबूतर हम से हम सुलैमान बनेंगे जो परी होगे तुम होश में आओ कहाँ जाओगे उड़ कर हम से गालियाँ कौन सुने जब न रहा कुछ मतलब आज से कीजिएगा बात समझ कर हम से हम किसी और को ताकेंगे तुम्हारे होते क्या कहा फिर तो कहो आँख मिला कर हम से आप हो जाएँगे सीधे कहीं दिन हों सीधे वो भी टेढ़े हैं जो टेढ़ा है मुक़द्दर हम से वो भी क्या दिन थे कि जब रहती थीं नीची नज़रें चार आँखें जो हुईं फिर गए तेवर हम से
Lala Madhav Ram Jauhar
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