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दिल मिरा ख़्वाब-गाह-ए-दिलबर है बस यही एक सोने का घर है ज़ुल्फ़ें मुँह पर हैं मुँह है ज़ुल्फ़ों में रात भर सुब्ह शाम दिन भर है चश्म-ए-इंसाफ़ से नज़ारा कर एक क़तरा यहाँ समुंदर है बहुत ईज़ा उठाई फ़ुर्क़त की अब नहीं इख़्तियार दिल पर है देख कर चाँद सा तुम्हारा मुँह आईना मेरी तरह शश्दर है दिल मिलाऊँ मैं क्या तिरे दिल से एक शीशा है एक पत्थर है

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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे

Umair Najmi

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी

Zubair Ali Tabish

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रात दिन चैन हम ऐ रश्क-ए-क़मर रखते हैं  शाम अवध की तो बनारस की सहर रखते हैं  भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया  ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं  ढूँढ़ लेता मैं अगर और किसी जा होते  क्या कहूँ आप दिल-ए-ग़ैर में घर रखते हैं  अश्क क़ाबू में नहीं राज़ छुपाऊँ क्यूँँकर  दुश्मनी मुझ से मिरे दीदा-ए-तर रखते हैं  कैसे बे-रहम हैं सय्याद इलाही तौबा  मौसम-ए-गुल में मुझे काट के पर रखते हैं  कौन हैं हम से सिवा नाज़ उठाने वाले  सामने आएँ जो दिल और जिगर रखते हैं  दिल तो क्या चीज़ है पत्थर हो तो पानी हो जाए  मेरे नाले अभी इतना तो असर रखते हैं  चार दिन के लिए दुनिया में लड़ाई कैसी  वो भी क्या लोग हैं आपस में शरर रखते हैं  हाल-ए-दिल यार को महफ़िल में सुनाऊँ क्यूँँ कर  मुद्दई कान उधर और इधर रखते हैं  जल्वा-ए-यार किसी को नज़र आता कब है  देखते हैं वही उस को जो नज़र रखते हैं  आशिक़ों पर है दिखाने को इताब ऐ 'जौहर'  दिल में महबूब इनायत की नज़र रखते हैं  अश्क क़ाबू में नहीं राज़ छुपाऊँ क्यूँँकर  दुश्मनी मुझ से मिरे दीदा-ए-तर रखते हैं  कैसे बे-रहम हैं सय्याद इलाही तौबा  मौसम-ए-गुल में मुझे काट के पर रखते हैं  कौन हैं हम से सिवा नाज़ उठाने वाले  सामने आएँ जो दिल और जिगर रखते हैं  दिल तो क्या चीज़ है पत्थर हो तो पानी हो जाए  मेरे नाले अभी इतना तो असर रखते हैं  चार दिन के लिए दुनिया में लड़ाई कैसी  वो भी क्या लोग हैं आपस में शरर रखते हैं  हाल-ए-दिल यार को महफ़िल में सुनाऊँ क्यूँँ कर  मुद्दई कान उधर और इधर रखते हैं  जल्वा-ए-यार किसी को नज़र आता कब है  देखते हैं वही उस को जो नज़र रखते हैं  आशिक़ों पर है दिखाने को इताब ऐ 'जौहर'  दिल में महबूब इनायत की नज़र रखते हैं

Lala Madhav Ram Jauhar

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तेरे कूचे की हुआ लग गई शायद उस को रोज़ बे-पर की उड़ाता है कबूतर हम से हम सुलैमान बनेंगे जो परी होगे तुम होश में आओ कहाँ जाओगे उड़ कर हम से गालियाँ कौन सुने जब न रहा कुछ मतलब आज से कीजिएगा बात समझ कर हम से हम किसी और को ताकेंगे तुम्हारे होते क्या कहा फिर तो कहो आँख मिला कर हम से आप हो जाएँगे सीधे कहीं दिन हों सीधे वो भी टेढ़े हैं जो टेढ़ा है मुक़द्दर हम से वो भी क्या दिन थे कि जब रहती थीं नीची नज़रें चार आँखें जो हुईं फिर गए तेवर हम से

Lala Madhav Ram Jauhar

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क्या याद कर के रोऊँ कि कैसा शबाब था कुछ भी न था हवा थी कहानी थी ख़्वाब था अब इत्र भी मलो तो तकल्लुफ़ की बू कहाँ वो दिन हवा हुए जो पसीना गुलाब था महमिल-नशीं जब आप थे लैला के भेस में मजनूँ के भेस में कोई ख़ाना-ख़राब था तेरा क़ुसूर-वार ख़ुदा का गुनाहगार जो कुछ कि था यही दिल-ए-ख़ाना-ख़राब था ज़र्रा समझ के यूँँ न मिला मुझ को ख़ाक में ऐ आसमान मैं भी कभी आफ़्ताब था

Lala Madhav Ram Jauhar

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