ghazalKuch Alfaaz

तेरे कूचे की हुआ लग गई शायद उस को रोज़ बे-पर की उड़ाता है कबूतर हम से हम सुलैमान बनेंगे जो परी होगे तुम होश में आओ कहाँ जाओगे उड़ कर हम से गालियाँ कौन सुने जब न रहा कुछ मतलब आज से कीजिएगा बात समझ कर हम से हम किसी और को ताकेंगे तुम्हारे होते क्या कहा फिर तो कहो आँख मिला कर हम से आप हो जाएँगे सीधे कहीं दिन हों सीधे वो भी टेढ़े हैं जो टेढ़ा है मुक़द्दर हम से वो भी क्या दिन थे कि जब रहती थीं नीची नज़रें चार आँखें जो हुईं फिर गए तेवर हम से

Related Ghazal

बरसों पुराना दोस्त मिला जैसे ग़ैर हो देखा रुका झिझक के कहा तुम उमैर हो मिलते हैं मुश्किलों से यहाँ हम-ख़याल लोग तेरे तमाम चाहने वालों की ख़ैर हो कमरे में सिगरेटों का धुआँ और तेरी महक जैसे शदीद धुंध में बाग़ों की सैर हो हम मुत्मइन बहुत हैं अगर ख़ुश नहीं भी हैं तुम ख़ुश हो क्या हुआ जो हमारे बग़ैर हो पैरों में उस के सर को धरें इल्तिजा करें इक इल्तिजा कि जिस का न सर हो न पैर हो

Umair Najmi

59 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

130 likes

उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

107 likes

आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो

Himanshi babra KATIB

76 likes

More from Lala Madhav Ram Jauhar

दिल मिरा ख़्वाब-गाह-ए-दिलबर है बस यही एक सोने का घर है ज़ुल्फ़ें मुँह पर हैं मुँह है ज़ुल्फ़ों में रात भर सुब्ह शाम दिन भर है चश्म-ए-इंसाफ़ से नज़ारा कर एक क़तरा यहाँ समुंदर है बहुत ईज़ा उठाई फ़ुर्क़त की अब नहीं इख़्तियार दिल पर है देख कर चाँद सा तुम्हारा मुँह आईना मेरी तरह शश्दर है दिल मिलाऊँ मैं क्या तिरे दिल से एक शीशा है एक पत्थर है

Lala Madhav Ram Jauhar

0 likes

रात दिन चैन हम ऐ रश्क-ए-क़मर रखते हैं  शाम अवध की तो बनारस की सहर रखते हैं  भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया  ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं  ढूँढ़ लेता मैं अगर और किसी जा होते  क्या कहूँ आप दिल-ए-ग़ैर में घर रखते हैं  अश्क क़ाबू में नहीं राज़ छुपाऊँ क्यूँँकर  दुश्मनी मुझ से मिरे दीदा-ए-तर रखते हैं  कैसे बे-रहम हैं सय्याद इलाही तौबा  मौसम-ए-गुल में मुझे काट के पर रखते हैं  कौन हैं हम से सिवा नाज़ उठाने वाले  सामने आएँ जो दिल और जिगर रखते हैं  दिल तो क्या चीज़ है पत्थर हो तो पानी हो जाए  मेरे नाले अभी इतना तो असर रखते हैं  चार दिन के लिए दुनिया में लड़ाई कैसी  वो भी क्या लोग हैं आपस में शरर रखते हैं  हाल-ए-दिल यार को महफ़िल में सुनाऊँ क्यूँँ कर  मुद्दई कान उधर और इधर रखते हैं  जल्वा-ए-यार किसी को नज़र आता कब है  देखते हैं वही उस को जो नज़र रखते हैं  आशिक़ों पर है दिखाने को इताब ऐ 'जौहर'  दिल में महबूब इनायत की नज़र रखते हैं  अश्क क़ाबू में नहीं राज़ छुपाऊँ क्यूँँकर  दुश्मनी मुझ से मिरे दीदा-ए-तर रखते हैं  कैसे बे-रहम हैं सय्याद इलाही तौबा  मौसम-ए-गुल में मुझे काट के पर रखते हैं  कौन हैं हम से सिवा नाज़ उठाने वाले  सामने आएँ जो दिल और जिगर रखते हैं  दिल तो क्या चीज़ है पत्थर हो तो पानी हो जाए  मेरे नाले अभी इतना तो असर रखते हैं  चार दिन के लिए दुनिया में लड़ाई कैसी  वो भी क्या लोग हैं आपस में शरर रखते हैं  हाल-ए-दिल यार को महफ़िल में सुनाऊँ क्यूँँ कर  मुद्दई कान उधर और इधर रखते हैं  जल्वा-ए-यार किसी को नज़र आता कब है  देखते हैं वही उस को जो नज़र रखते हैं  आशिक़ों पर है दिखाने को इताब ऐ 'जौहर'  दिल में महबूब इनायत की नज़र रखते हैं

Lala Madhav Ram Jauhar

0 likes

क्या याद कर के रोऊँ कि कैसा शबाब था कुछ भी न था हवा थी कहानी थी ख़्वाब था अब इत्र भी मलो तो तकल्लुफ़ की बू कहाँ वो दिन हवा हुए जो पसीना गुलाब था महमिल-नशीं जब आप थे लैला के भेस में मजनूँ के भेस में कोई ख़ाना-ख़राब था तेरा क़ुसूर-वार ख़ुदा का गुनाहगार जो कुछ कि था यही दिल-ए-ख़ाना-ख़राब था ज़र्रा समझ के यूँँ न मिला मुझ को ख़ाक में ऐ आसमान मैं भी कभी आफ़्ताब था

Lala Madhav Ram Jauhar

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Lala Madhav Ram Jauhar.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Lala Madhav Ram Jauhar's ghazal.