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sabhi ye puchhte rahte hain kya gum ho gaya hai bata duun? mujh se khud apna pata gum ho gaya hai tumhare din men ik rudad thi jo kho gai hai hamari raat men ik khvab thaa, gum ho gaya hai vo jis ke pech-o-kham men dastan lipti hui thi kahani men kahin vo majra gum ho gaya hai zara ahl-e-junun aao hamen rasta sujhao yahan ham aql valon ka khuda gum ho gaya hai nazar baaqi hai lekin tab-e-nazzara nahin ab sukhan baaqi hai lekin muddaa gum ho gaya hai mujhe dukh hai ki zakhm o ranj ke is jamghate men tumhara aur mera vaqia gum ho gaya hai ye shiddat dard ki us ke na hone se na hoti yaqinan aur kuchh us ke siva gum ho gaya hai vo jis ko khinchne se zaat ki parten khulengi hamari zindagi ka vo sira gum ho gaya hai vo dar va ho na ho, azad o khud-bin ham kahan ke palat aaen to samjho rasta gum ho gaya hai sabhi ye puchhte rahte hain kya gum ho gaya hai bata dun? mujh se khud apna pata gum ho gaya hai tumhaare din mein ek rudad thi jo kho gai hai hamari raat mein ek khwab tha, gum ho gaya hai wo jis ke pech-o-kham mein dastan lipti hui thi kahani mein kahin wo majra gum ho gaya hai zara ahl-e-junun aao hamein rasta sujhao yahan hum aql walon ka khuda gum ho gaya hai nazar baqi hai lekin tab-e-nazzara nahin ab sukhan baqi hai lekin muddaa gum ho gaya hai mujhe dukh hai ki zakhm o ranj ke is jamghate mein tumhaara aur mera waqia gum ho gaya hai ye shiddat dard ki us ke na hone se na hoti yaqinan aur kuchh us ke siwa gum ho gaya hai wo jis ko khinchne se zat ki parten khulengi hamari zindagi ka wo sira gum ho gaya hai wo dar wa ho na ho, aazad o khud-bin hum kahan ke palat aaen to samjho rasta gum ho gaya hai

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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कोई मिला तो किसी और की कमी हुई है सो दिल ने बे-तलबी इख़्तियार की हुई है जहाँ से दिल की तरफ़ ज़िंदगी उतरती थी निगाह अब भी उसी बाम पर जमी हुई है है इंतिज़ार उसे भी तुम्हारी ख़ुश-बू का हवा गली में बहुत देर से रुकी हुई है तुम आ गए हो तो अब आईना भी देखेंगे अभी अभी तो निगाहों में रौशनी हुई है हमारा इल्म तो मरहून-ए-लौह-ए-दिल है मियाँ किताब-ए-अक़्ल तो बस ताक़ पर धरी हुई है बनाओ साए हरारत बदन में जज़्ब करो कि धूप सेहन में कब से यूँँही पड़ी हुई है नहीं नहीं मैं बहुत ख़ुश रहा हूँ तेरे बग़ैर यक़ीन कर कि ये हालत अभी अभी हुई है वो गुफ़्तुगू जो मिरी सिर्फ़ अपने-आप से थी तिरी निगाह को पहुँची तो शा'इरी हुई है

Irfan Sattar

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मुझे क्या ख़बर थी मुझे दूसरों ने बताया मैं कैसा हूँ क्या आदमी हूँ ये सब सुन के मुझ को भी लगने लगा है कि मैं वाक़ई इक बुरा आदमी हूँ किसी को सरोकार क्या मुझ में फैली हुई इस क़यामत की बेचारगी से अगर कोई मुझ सेे तअल्लुक़ भी रखता है तो यूँँ कि मैं काम का आदमी हूँ तुम्हें ये गिला है कि मैं वो नहीं जिस से तुम ने मोहब्बत के पैमा किए थे मुझे भी ये महसूस होने लगा है कि मैं वो नहीं दूसरा आदमी हूँ सभी हस्ब-ए-ख़्वाहिश ब-क़द्र-ए-ज़रूरत मुझे जानते हैं मुझे छानते हैं किसी को कहाँ इतनी फ़ुर्सत जो देखे कि मैं कितना टूटा हुआ आदमी हूँ मैं अपनी हक़ीक़त को संदूक़ में बंद कर के हर एक सुब्ह जाता हूँ दफ़्तर कभी शाम के बा'द देखो कि मैं कैसा पुर-हाल पुर-माजरा आदमी हूँ मैं सच बोलता हूँ कभी टोकता हूँ तो क्यूँँ आप ऐसे बुरा मानते हैं अज़ीज़ान-ए-मन आप समझे तो मुझ को कि मैं असल में आप का आदमी हूँ मैं इक़्लीम के और तक़्वीम के किस ग़लत रास्ते से यहाँ आ गया था मैं इस दौर में जी रहा हूँ तो बस ये समझ लो कि मैं मोजिज़ा आदमी हूँ अँधेरा तहय्युर ख़मोशी उदासी मुजर्रद हयूले जुनूँ बे-क़रारी ये तफ़सील सुन कर समझ तो गए हो कि मैं दिन नहीं रात का आदमी हूँ ये क्या ज़िंदगी है ये कैसा तमाशा है मैं इस तमाशे में क्या कर रहा हूँ मैं रोज़-ए-अज़ल से कुछ ऐसे सवालों की तकलीफ़ में मुब्तला आदमी हूँ मेरी बद-दिमाग़ी मुनाफ़िक़ रवय्यों से महफ़ूज़ रहने का है इक तरीक़ा मेरे पास आओ मेरे पास बैठो कि मैं तो सरापा दुआ आदमी हूँ मैं अपने तसव्वुर में तख़्लीक़ करता हूँ इक ऐसी दुनिया जो है मेरी दुनिया मेरी अपनी मर्ज़ी की एक ज़िंदगी है मैं तन्हाइयों में ख़ुदा आदमी हूँ मेरा क्या त'अर्रुफ़ मेरा नाम 'इरफ़ान' है और मेरी है इतनी कहानी मैं हर दौर का वाक़ि'आ आदमी हूँ मैं हर अहद का सानिहा आदमी हूँ

Irfan Sattar

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