ghazalKuch Alfaaz

शैतान के दिल पर चलता हूँ सीनों में सफ़र करता हूँ उस आँख का क्या बचता है मैं जिस आँख में घर करता हूँ जो मुझ में उतरे हैं उन को मेरी लहरों का अंदाज़ा है दरियाओ में उठता बैठता हूँ सैलाब बसर करता हूँ मेरी तन्हाई का बोझ तुम्हारी बिनाई ले डूबेगा मुझे इतना क़रीब से मत देखो आँखों पर असर करता हूँ

Tehzeeb Hafi63 Likes

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Tehzeeb Hafi's ghazal.

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Tehzeeb Hafi.