सलाम उस पर अगर ऐसा कोई फ़नकार हो जाए सियाही ख़ून बन जाए क़लम तलवार हो जाए ज़माने से कहो कुछ साइक़ा-रफ़्तार हो जाए हमारे साथ चलने के लिए तय्यार हो जाए ज़माने को तमन्ना है तिरा दीदार करने की मुझे ये फ़िक्र है मुझ को मिरा दीदार हो जाए वो ज़ुल्फ़ें साँप हैं बे-शक अगर ज़ंजीर बन जाएँ मोहब्बत ज़हर है बे-शक अगर आज़ार हो जाए मोहब्बत से तुम्हें सरकार कहते हैं वगरना हम निगाहें डाल दें जिस पर वही सरकार हो जाए
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
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ख़ानक़ाह में सूफ़ी मुँह छुपाए बैठा है ग़ालिबन ज़माने से मात खाए बैठा है क़त्ल तो नहीं बदला क़त्ल की अदा बदली तीर की जगह क़ातिल साज़ उठाए बैठा है उन के चाहने वाले धूप धूप फिरते हैं ग़ैर उन के कूचे में साए साए बैठा है वाए आशिक़-ए-नादाँ काएनात ये तेरी इक शिकस्ता शीशे को दिल बनाए बैठा है दूर बारिश ऐ गुलचीं वा है दीदा-ए-नर्गिस आज हर गुल-ए-नर्गिस ख़ार खाए बैठा है
Kaif Bhopali
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तुम से न मिल के ख़ुश हैं वो दावा किधर गया दो रोज़ में गुलाब सा चेहरा उतर गया जान-ए-बहार तुम ने वो काँटे चुभोए हैं मैं हर गुल-ए-शगुफ़्ता को छूने से डर गया इस दिल के टूटने का मुझे कोई ग़म नहीं अच्छा हुआ कि पाप कटा दर्द-ए-सर गया मैं भी समझ रहा हूँ कि तुम तुम नहीं रहे तुम भी ये सोच लो कि मिरा 'कैफ़' मर गया
Kaif Bhopali
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हाए लोगों की करम-फ़रमाइयाँ तोहमतें बदनामियाँ रुस्वाइयाँ ज़िंदगी शायद इसी का नाम है दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ क्या ज़माने में यूँँ ही कटती है रात करवटें बेताबियाँ अंगड़ाइयाँ क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार आहटें घबराहटें परछाइयाँ एक रिंद-ए-मस्त की ठोकर में हैं शाहियाँ सुलतानियाँ दाराइयाँ एक पैकर में सिमट कर रह गईं ख़ूबियाँ ज़ेबाइयाँ रानाइयाँ रह गईं इक तिफ़्ल-ए-मकतब के हुज़ूर हिकमतें आगाहियाँ दानाइयाँ ज़ख़्म दिल के फिर हरे करने लगीं बदलियाँ बरखा रुतें पुरवाइयाँ दीदा-ओ-दानिस्ता उन के सामने लग़्ज़िशें नाकामियाँ पसपाइयाँ मेरे दिल की धड़कनों में ढल गईं चूड़ियाँ मौसीक़ियाँ शहनाइयाँ उन से मिल कर और भी कुछ बढ़ गईं उलझनें फ़िक्रें क़यास-आराइयाँ 'कैफ़' पैदा कर समुंदर की तरह वुसअतें ख़ामोशियाँ गहराइयाँ
Kaif Bhopali
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थोड़ा सा अक्स चाँद के पैकर में डाल दे तू आ के जान रात के मंज़र में डाल दे जिस दिन मिरी जबीं किसी दहलीज़ पर झुके उस दिन ख़ुदा शिगाफ़ मिरे सर में डाल दे अल्लाह तेरे साथ है मल्लाह को न देख ये टूटी फूटी नाव समुंदर में डाल दे आ तेरे माल ओ ज़र को मैं तक़्दीस बख़्श दूँ ला अपना माल ओ ज़र मिरी ठोकर में डाल दे भाग ऐसे रहनुमा से जो लगता है ख़िज़्र सा जाने ये किस जगह तुझे चक्कर में डाल दे इस से तिरे मकान का मंज़र है बद-नुमा चिंगारी मेरे फूस के छप्पर में डाल दे मैं ने पनाह दी तुझे बारिश की रात में तू जाते जाते आग मिरे घर में डाल दे ऐ 'कैफ़' जागते तुझे पिछ्ला पहर हुआ अब लाश जैसे जिस्म को बिस्तर में डाल दे
Kaif Bhopali
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हाए लोगों की करम-फ़रमाइयाँ तोहमतें बदनामियाँ रुस्वाइयाँ ज़िंदगी शायद इसी का नाम है दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ क्या ज़माने में यूँँ ही कटती है रात करवटें बेताबियाँ अंगड़ाइयाँ क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार आहटें घबराहटें परछाइयाँ एक रिंद-ए-मस्त की ठोकर में हैं शाहियाँ सुलतानियाँ दाराइयाँ एक पैकर में सिमट कर रह गईं ख़ूबियाँ ज़ेबाइयाँ रानाइयाँ रह गईं इक तिफ़्ल-ए-मकतब के हुज़ूर हिकमतें आगाहियाँ दानाइयाँ ज़ख़्म दिल के फिर हरे करने लगीं बदलियाँ बरखा रुतें पुरवाइयाँ दीदा-ओ-दानिस्ता उन के सामने लग़्ज़िशें नाकामियाँ पसपाइयाँ मेरे दिल की धड़कनों में ढल गईं चूड़ियाँ मौसीक़ियाँ शहनाइयाँ उन से मिल कर और भी कुछ बढ़ गईं उलझनें फ़िक्रें क़यास-आराइयाँ 'कैफ़' पैदा कर समुंदर की तरह वुसअतें ख़ामोशियाँ गहराइयाँ
Kaif Bhopali
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