हाए लोगों की करम-फ़रमाइयाँ तोहमतें बदनामियाँ रुस्वाइयाँ ज़िंदगी शायद इसी का नाम है दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ क्या ज़माने में यूँँ ही कटती है रात करवटें बेताबियाँ अंगड़ाइयाँ क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार आहटें घबराहटें परछाइयाँ एक रिंद-ए-मस्त की ठोकर में हैं शाहियाँ सुलतानियाँ दाराइयाँ एक पैकर में सिमट कर रह गईं ख़ूबियाँ ज़ेबाइयाँ रानाइयाँ रह गईं इक तिफ़्ल-ए-मकतब के हुज़ूर हिकमतें आगाहियाँ दानाइयाँ ज़ख़्म दिल के फिर हरे करने लगीं बदलियाँ बरखा रुतें पुरवाइयाँ दीदा-ओ-दानिस्ता उन के सामने लग़्ज़िशें नाकामियाँ पसपाइयाँ मेरे दिल की धड़कनों में ढल गईं चूड़ियाँ मौसीक़ियाँ शहनाइयाँ उन से मिल कर और भी कुछ बढ़ गईं उलझनें फ़िक्रें क़यास-आराइयाँ 'कैफ़' पैदा कर समुंदर की तरह वुसअतें ख़ामोशियाँ गहराइयाँ
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तुझे ना आएंगी मुफ़लिस की मुश्किलात समझ मैं छोटे लोगों के घर का बड़ा हूँ बात समझ मेरे इलावा हैं छे लोग मुनहसीर मुझ पर मेरी हर एक मुसीबत को जर्ब सात समझ दिल ओ दिमाग ज़रूरी हैं ज़िन्दगी के लिए ये हाथ पाऊँ इज़ाफ़ी सहूलियत समझ फ़लक से कट के ज़मीन पर गिरी पतंगें देख तू हिज्र काटने वालों की नफ़सियात समझ किताब-ए-इश्क़ में हर आह एक आयत है और आँसुओं को हुरूफ-ए-मुक़त्तेआत समझ
Umair Najmi
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दशरथ जी की बंजर आँखें कैकेई की विषधर आँखें राम गए वन बनने भगवन कौशल्या की पत्थर आँखें भाई लखन सा कोई न दूजा चलने को हैं तत्पर आँखें आग लगी है सब आँखों में माँ सीता हैं पुष्कर आँखें उर्मिल को कोई क्या लिक्खे तन्हाई का अंबर आँखें काट गई हैं कर्म की रेखा इक दासी की ख़ंजर आँखें छोड़ नगर को जाते रघुवर सब लोगों की झर-झर आँखें
Ravi Goswami
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किसी दिन ज़िंदगानी में करिश्मा क्यूँँ नहीं होता मैं हर दिन जाग तो जाता हूँ ज़िंदा क्यूँँ नहीं होता मिरी इक ज़िंदगी के कितने हिस्से-दार हैं लेकिन किसी की ज़िंदगी में मेरा हिस्सा क्यूँँ नहीं होता जहाँ में यूँँ तो होने को बहुत कुछ होता रहता है मैं जैसा सोचता हूँ कुछ भी वैसा क्यूँँ नहीं होता हमेशा तंज़ करते हैं तबीअत पूछने वाले तुम अच्छा क्यूँँ नहीं करते मैं अच्छा क्यूँँ नहीं होता ज़माने भर के लोगों को किया है मुब्तला तू ने जो तेरा हो गया तू भी उसी का क्यूँँ नहीं होता
Rajesh Reddy
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ज़ेहन पर ज़ोर देने से भी याद नहीं आता कि हम क्या देखते थे सिर्फ़ इतना पता है कि हम आम लोगों से बिल्कुल जुदा देखते थे तब हमें अपने पुरखों से विरसे में आई हुई बद-दुआ याद आई जब कभी अपनी आँखों के आगे तुझे शहर जाता हुआ देखते थे सच बताएँ तो तेरी मोहब्बत ने ख़ुद पर तवज्जोह दिलाई हमारी तू हमें चूमता था तो घर जा के हम देर तक आईना देखते थे सारा दिन रेत के घर बनाते हुए और गिरते हुए बीत जाता शाम होते ही हम दूरबीनों में अपनी छतों से ख़ुदा देखते थे उस लड़ाई में दोनों तरफ़ कुछ सिपाही थे जो नींद में बोलते थे जंग टलती नहीं थी सिरों से मगर ख़्वाब में फ़ाख्ता देखते थे दोस्त किस को पता है कि वक़्त उस की आँखों से फिर किस तरह पेश आया हम इकट्ठे थे हँसते थे रोते थे इक दूसरे को बड़ा दखते थे
Tehzeeb Hafi
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तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था कोई ठहरा हो जो लोगों के मुक़ाबिल तो बताओ वो कहाँ हैं कि जिन्हें नाज़ बहुत अपने तईं था आज सोए हैं तह-ए-ख़ाक न जाने यहाँ कितने कोई शो'ला कोई शबनम कोई महताब-जबीं था अब वो फिरते हैं इसी शहर में तन्हा लिए दिल को इक ज़माने में मिज़ाज उन का सर-ए-अर्श-ए-बरीं था छोड़ना घर का हमें याद है 'जालिब' नहीं भूले था वतन ज़ेहन में अपने कोई ज़िंदाँ तो नहीं था
Habib Jalib
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तुम से न मिल के ख़ुश हैं वो दावा किधर गया दो रोज़ में गुलाब सा चेहरा उतर गया जान-ए-बहार तुम ने वो काँटे चुभोए हैं मैं हर गुल-ए-शगुफ़्ता को छूने से डर गया इस दिल के टूटने का मुझे कोई ग़म नहीं अच्छा हुआ कि पाप कटा दर्द-ए-सर गया मैं भी समझ रहा हूँ कि तुम तुम नहीं रहे तुम भी ये सोच लो कि मिरा 'कैफ़' मर गया
Kaif Bhopali
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ख़ानक़ाह में सूफ़ी मुँह छुपाए बैठा है ग़ालिबन ज़माने से मात खाए बैठा है क़त्ल तो नहीं बदला क़त्ल की अदा बदली तीर की जगह क़ातिल साज़ उठाए बैठा है उन के चाहने वाले धूप धूप फिरते हैं ग़ैर उन के कूचे में साए साए बैठा है वाए आशिक़-ए-नादाँ काएनात ये तेरी इक शिकस्ता शीशे को दिल बनाए बैठा है दूर बारिश ऐ गुलचीं वा है दीदा-ए-नर्गिस आज हर गुल-ए-नर्गिस ख़ार खाए बैठा है
Kaif Bhopali
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तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है तेरे आगे चाँद पुराना लगता है तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है आग का क्या है पल दो पल में लगती है बुझते बुझते एक ज़माना लगता है पाँव ना बाँधा पंछी का पर बाँधा आज का बच्चा कितना सियाना लगता है सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है हँसता चेहरा एक बहाना लगता है सुनने वाले घंटों सुनते रहते हैं मेरा फ़साना सब का फ़साना लगता है 'कैफ़' बता क्या तेरी ग़ज़ल में जादू है बच्चा बच्चा तेरा दिवाना लगता है
Kaif Bhopali
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तन-ए-तन्हा मुक़ाबिल हो रहा हूँ मैं हज़ारों से हसीनों से रक़ीबों से ग़मों से ग़म-गुसारों से उन्हें मैं छीन कर लाया हूँ कितने दावेदारों से शफ़क़ से चाँदनी रातों से फूलों से सितारों से सुने कोई तो अब भी रौशनी आवाज़ देती है पहाड़ों से गुफाओं से बयाबानों से ग़ारों से हमारे दाग़-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं गुलों से गुल-रुख़ों से मह-वशों से माह-पारों से कभी होता नहीं महसूस वो यूँँ क़त्ल करते हैं निगाहों से कनखियों से अदाओं से इशारों से हमेशा एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है कुओं से पनघटों से नद्दियों से आबशारों से न आए पर न आए वो उन्हें क्या क्या ख़बर भेजी लिफ़ाफ़ों से ख़तों से दुख भरे पर्चों से तारों से ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से वो दिन भी हाए क्या दिन थे जब अपना भी तअ'ल्लुक़ था दशहरे से दिवाली से बसंतों से बहारों से कभी पत्थर के दिल ऐ 'कैफ़' पिघले हैं न पिघलेंगे मुनाजातों से फ़रियादों से चीख़ों से पुकारों से
Kaif Bhopali
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इस तरह मोहब्बत में दिल पे हुक्मरानी है दिल नहीं मिरा गोया उन की राजधानी है घास के घरौंदे से ज़ोर-आज़माई क्या आँधियाँ भी पगली हैं बर्क़ भी दिवानी है शायद उन के दामन ने पोंछ दीं मिरी आँखें आज मेरे अश्कों का रंग ज़ा'फ़रानी है पूछते हो क्या बाबा क्या हुआ दिल-ए-ज़िंदा वो मिरा दिल-ए-ज़िंदा आज आँ-जहानी है 'कैफ़' तुझ को दुनिया ने क्या से क्या बना डाला यार अब तिरे मुँह पर रंग है न पानी है
Kaif Bhopali
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