ज़ेहन पर ज़ोर देने से भी याद नहीं आता कि हम क्या देखते थे सिर्फ़ इतना पता है कि हम आम लोगों से बिल्कुल जुदा देखते थे तब हमें अपने पुरखों से विरसे में आई हुई बद-दुआ याद आई जब कभी अपनी आँखों के आगे तुझे शहर जाता हुआ देखते थे सच बताएँ तो तेरी मोहब्बत ने ख़ुद पर तवज्जोह दिलाई हमारी तू हमें चूमता था तो घर जा के हम देर तक आईना देखते थे सारा दिन रेत के घर बनाते हुए और गिरते हुए बीत जाता शाम होते ही हम दूरबीनों में अपनी छतों से ख़ुदा देखते थे उस लड़ाई में दोनों तरफ़ कुछ सिपाही थे जो नींद में बोलते थे जंग टलती नहीं थी सिरों से मगर ख़्वाब में फ़ाख्ता देखते थे दोस्त किस को पता है कि वक़्त उस की आँखों से फिर किस तरह पेश आया हम इकट्ठे थे हँसते थे रोते थे इक दूसरे को बड़ा दखते थे
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं
Dagh Dehlvi
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बग़ैर उस को बताए निभाना पड़ता है ये इश्क़ राज़ है इस को छुपाना पड़ता है मैं अपने ज़ेहन की ज़िदस बहुत परेशाँ हूँ तेरे ख़याल की चौखट पे आना पड़ता है तेरे बग़ैर ही अच्छे थे क्या मुसीबत है ये कैसा प्यार है हर दिन जताना पड़ता है
Mehshar Afridi
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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे
Jaun Elia
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अजीब ख़्वाब था उस के बदन में काई थी वो इक परी जो मुझे सब्ज़ करने आई थी वो इक चराग़-कदा जिस में कुछ नहीं था मेरा वो जल रही थी वो क़िंदील भी पराई थी न जाने कितने परिंदों ने इस में शिरकत की कल एक पेड़ की तरक़ीब-ए-रू-नुमाई थी हवाओं आओ मिरे गाँव की तरफ़ देखो जहाँ ये रेत है पहले यहाँ तराई थी किसी सिपाह ने ख़े में लगा दिए हैं वहाँ जहाँ ये मैं ने निशानी तिरी दबाई थी गले मिला था कभी दुख भरे दिसम्बर से मिरे वजूद के अंदर भी धुँद छाई थी
Tehzeeb Hafi
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रात को दीप की लो कम नहीं रखी जाती धुंध में रौशनी मध्यम नहीं रखी जाती कैसे दरिया की हिफाजत तेरे जिम्में ठहराऊ तुझ से इक आँख अगर नम नहीं रखी जाती इस लिए छोड़कर जाने लगे सब चारागरा ज़ख़्म से इज्जते मरहम नहीं रखी जाति ऐसे कैसे मैं तुझे चाहने लग जाऊँ भला घर की बुनियाद तो यकदम नहीं रखी जाती
Tehzeeb Hafi
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क्या ख़बर उस रौशनी में और क्या रौशन हुआ जब वो इन हाथों से पहली मर्तबा रौशन हुआ वो मेरे सीने से लग कर जिस को रोई कौन था किस के बुझने पे मैं आज उस की जगह रौशन हुआ वैसे मैं इन रास्तों और ताख़चों का था नहीं फिर भी तू ने जिस जगह पर रख दिया रौशन हुआ मेरे जाने पर सभी रोए बहुत रोए मगर इक दिया मेरी तवक़्क़ो से सिवा रौशन हुआ तेरे अपने तेरी किरनों को तरसते है यहाँ तू ये किन गलियों में किन लोगों में जा रौशन हुआ मैं ने पूछा था कि मुझ जैसा भी कोई और है दूर जंगल में कहीं इक मकबरा रौशन हुआ जाने कैसी आग में वो जल रहा है इन दिनों उस ने मुँह पोंछा तो मेरा तौलिया रौशन हुआ कोई उस की रौशनी के शर से कब महफ़ूज़ है मेरी आँखें बुझ गई और कोयला रौशन हुआ
Tehzeeb Hafi
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जब उस की तस्वीर बनाया करता था कमरा रंगों से भर जाया करता था पेड़ मुझे हसरत से देखा करते थे मैं जंगल में पानी लाया करता था थक जाता था बादल साया करते करते और फिर मैं बादल पे साया करता था बैठा रहता था साहिल पे सारा दिन दरिया मुझ से जान छुड़ाया करता था बिंत-ए-सहरा रूठा करती थी मुझ से मैं सहरा से रेत चुराया करता था
Tehzeeb Hafi
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कितनी रातें काट चुका हूँ पर वो वस्ल का दिन इस दरिया से पहले कितने जंगल आते हैं हमें तो नींद भी आती है तो आधी आती है वो कैसे हैं जिन को ख़्वाब मुकम्मल आते हैं इस रस्ते पर पेड़ भी आते हैं उस ने पूछा जल कर ख़ुशबू देने वाले संदल आते हैं कौन है जो इस दिल में ख़ामोशी से उतरेगा देखो इस आवाज़ पे कितने पागल आते हैं इक से भड़ कर एक सवारी अस्प-औ-फील भी है जाने क्यूँ हम तेरी ज़ानिब पैदल आते हैं
Tehzeeb Hafi
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