ghazalKuch Alfaaz

तन-ए-तन्हा मुक़ाबिल हो रहा हूँ मैं हज़ारों से हसीनों से रक़ीबों से ग़मों से ग़म-गुसारों से उन्हें मैं छीन कर लाया हूँ कितने दावेदारों से शफ़क़ से चाँदनी रातों से फूलों से सितारों से सुने कोई तो अब भी रौशनी आवाज़ देती है पहाड़ों से गुफाओं से बयाबानों से ग़ारों से हमारे दाग़-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं गुलों से गुल-रुख़ों से मह-वशों से माह-पारों से कभी होता नहीं महसूस वो यूँँ क़त्ल करते हैं निगाहों से कनखियों से अदाओं से इशारों से हमेशा एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है कुओं से पनघटों से नद्दियों से आबशारों से न आए पर न आए वो उन्हें क्या क्या ख़बर भेजी लिफ़ाफ़ों से ख़तों से दुख भरे पर्चों से तारों से ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से वो दिन भी हाए क्या दिन थे जब अपना भी तअ'ल्लुक़ था दशहरे से दिवाली से बसंतों से बहारों से कभी पत्थर के दिल ऐ 'कैफ़' पिघले हैं न पिघलेंगे मुनाजातों से फ़रियादों से चीख़ों से पुकारों से

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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तुम से न मिल के ख़ुश हैं वो दावा किधर गया  दो रोज़ में गुलाब सा चेहरा उतर गया  जान-ए-बहार तुम ने वो काँटे चुभोए हैं  मैं हर गुल-ए-शगुफ़्ता को छूने से डर गया  इस दिल के टूटने का मुझे कोई ग़म नहीं  अच्छा हुआ कि पाप कटा दर्द-ए-सर गया  मैं भी समझ रहा हूँ कि तुम तुम नहीं रहे  तुम भी ये सोच लो कि मिरा 'कैफ़' मर गया

Kaif Bhopali

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तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है तेरे आगे चाँद पुराना लगता है तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है आग का क्या है पल दो पल में लगती है बुझते बुझते एक ज़माना लगता है पाँव ना बाँधा पंछी का पर बाँधा आज का बच्चा कितना सियाना लगता है सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है हँसता चेहरा एक बहाना लगता है सुनने वाले घंटों सुनते रहते हैं मेरा फ़साना सब का फ़साना लगता है 'कैफ़' बता क्या तेरी ग़ज़ल में जादू है बच्चा बच्चा तेरा दिवाना लगता है

Kaif Bhopali

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ख़ानक़ाह में सूफ़ी मुँह छुपाए बैठा है ग़ालिबन ज़माने से मात खाए बैठा है क़त्ल तो नहीं बदला क़त्ल की अदा बदली तीर की जगह क़ातिल साज़ उठाए बैठा है उन के चाहने वाले धूप धूप फिरते हैं ग़ैर उन के कूचे में साए साए बैठा है वाए आशिक़-ए-नादाँ काएनात ये तेरी इक शिकस्ता शीशे को दिल बनाए बैठा है दूर बारिश ऐ गुलचीं वा है दीदा-ए-नर्गिस आज हर गुल-ए-नर्गिस ख़ार खाए बैठा है

Kaif Bhopali

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सलाम उस पर अगर ऐसा कोई फ़नकार हो जाए सियाही ख़ून बन जाए क़लम तलवार हो जाए ज़माने से कहो कुछ साइक़ा-रफ़्तार हो जाए हमारे साथ चलने के लिए तय्यार हो जाए ज़माने को तमन्ना है तिरा दीदार करने की मुझे ये फ़िक्र है मुझ को मिरा दीदार हो जाए वो ज़ुल्फ़ें साँप हैं बे-शक अगर ज़ंजीर बन जाएँ मोहब्बत ज़हर है बे-शक अगर आज़ार हो जाए मोहब्बत से तुम्हें सरकार कहते हैं वगरना हम निगाहें डाल दें जिस पर वही सरकार हो जाए

Kaif Bhopali

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हाए लोगों की करम-फ़रमाइयाँ तोहमतें बदनामियाँ रुस्वाइयाँ ज़िंदगी शायद इसी का नाम है दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ क्या ज़माने में यूँँ ही कटती है रात करवटें बेताबियाँ अंगड़ाइयाँ क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार आहटें घबराहटें परछाइयाँ एक रिंद-ए-मस्त की ठोकर में हैं शाहियाँ सुलतानियाँ दाराइयाँ एक पैकर में सिमट कर रह गईं ख़ूबियाँ ज़ेबाइयाँ रानाइयाँ रह गईं इक तिफ़्ल-ए-मकतब के हुज़ूर हिकमतें आगाहियाँ दानाइयाँ ज़ख़्म दिल के फिर हरे करने लगीं बदलियाँ बरखा रुतें पुरवाइयाँ दीदा-ओ-दानिस्ता उन के सामने लग़्ज़िशें नाकामियाँ पसपाइयाँ मेरे दिल की धड़कनों में ढल गईं चूड़ियाँ मौसीक़ियाँ शहनाइयाँ उन से मिल कर और भी कुछ बढ़ गईं उलझनें फ़िक्रें क़यास-आराइयाँ 'कैफ़' पैदा कर समुंदर की तरह वुसअतें ख़ामोशियाँ गहराइयाँ

Kaif Bhopali

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