सर कटा कर सिफ़त-ए-शम्अ' जो मर जाते हैं नाम रौशन वही आफ़ाक़ में कर जाते हैं लाखों का ख़ून बहाएँगे वो जब होंगे जवाँ जो लड़कपन में लहू देख के डर जाते हैं जुम्बिश-ए-तेग़-ए-निगह की नहीं हाजत असलन काम मेरा वो इशारों ही में कर जाते हैं उन को उश्शाक़ ही के दिल की नहीं है तख़सीस कोई शीशा हो परी बन के उतर जाते हैं बर्क़ की तरह से बेताब जो हैं ऐ 'नादिर' तार-घर किस की वो लेने को ख़बर जाते हैं
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है
Umair Najmi
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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रूह तन्हा गई जन्नत को सुबुक-सारी से चार के काँधे उठा जिस्म गिराँबारी से ताक़ ताक़त है ग़म-ए-हिज्र की बीमारी से बैठते उठते हैं आहों की मदद-गारी से हुस्न-ए-रुख़्सार बढ़ा ख़त की नुमूदारी से ज़ीनत-ए-सफ़हा हुई जदवल-ए-ज़ंगारी से तू जो तलवार से नहलाए लहू में मुझ को ग़ुस्ल-ए-सेह्हत हुआ भी इश्क़ की बीमारी से और तो तर्क किया सब ने शब-ए-फ़ुर्क़त में बेकसी बाज़ न आई मिरी ग़म-ख़्वारी से
Kalb-E-Hussain Nadir
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दिल मुझे कुफ़्र आश्ना न करे बंदा बुत का हूँ मैं ख़ुदा न करे काटती है पतंग ग़ैरों की हम से तक्कल तिरे उड़ा न करे सुल्ह मंज़ूर है अगर तुम को आँख अग़्यार से लड़ा न करे क्यूँँ न आँचल दुपट्टे का लटके हो परी-ज़ाद पर लगा न करे है वो बुत अब तो महव-ए-यकताई डर ख़ुदा का न हो तो क्या न करे पढ़े 'नादिर' जो शेर-ए-तर्ज़-ए-जदीद सुन के क्यूँँ ख़ल्क़ वाह-वा न करे
Kalb-E-Hussain Nadir
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