दिल मुझे कुफ़्र आश्ना न करे बंदा बुत का हूँ मैं ख़ुदा न करे काटती है पतंग ग़ैरों की हम से तक्कल तिरे उड़ा न करे सुल्ह मंज़ूर है अगर तुम को आँख अग़्यार से लड़ा न करे क्यूँँ न आँचल दुपट्टे का लटके हो परी-ज़ाद पर लगा न करे है वो बुत अब तो महव-ए-यकताई डर ख़ुदा का न हो तो क्या न करे पढ़े 'नादिर' जो शेर-ए-तर्ज़-ए-जदीद सुन के क्यूँँ ख़ल्क़ वाह-वा न करे
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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रूह तन्हा गई जन्नत को सुबुक-सारी से चार के काँधे उठा जिस्म गिराँबारी से ताक़ ताक़त है ग़म-ए-हिज्र की बीमारी से बैठते उठते हैं आहों की मदद-गारी से हुस्न-ए-रुख़्सार बढ़ा ख़त की नुमूदारी से ज़ीनत-ए-सफ़हा हुई जदवल-ए-ज़ंगारी से तू जो तलवार से नहलाए लहू में मुझ को ग़ुस्ल-ए-सेह्हत हुआ भी इश्क़ की बीमारी से और तो तर्क किया सब ने शब-ए-फ़ुर्क़त में बेकसी बाज़ न आई मिरी ग़म-ख़्वारी से
Kalb-E-Hussain Nadir
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सर कटा कर सिफ़त-ए-शम्अ' जो मर जाते हैं नाम रौशन वही आफ़ाक़ में कर जाते हैं लाखों का ख़ून बहाएँगे वो जब होंगे जवाँ जो लड़कपन में लहू देख के डर जाते हैं जुम्बिश-ए-तेग़-ए-निगह की नहीं हाजत असलन काम मेरा वो इशारों ही में कर जाते हैं उन को उश्शाक़ ही के दिल की नहीं है तख़सीस कोई शीशा हो परी बन के उतर जाते हैं बर्क़ की तरह से बेताब जो हैं ऐ 'नादिर' तार-घर किस की वो लेने को ख़बर जाते हैं
Kalb-E-Hussain Nadir
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