रूह तन्हा गई जन्नत को सुबुक-सारी से चार के काँधे उठा जिस्म गिराँबारी से ताक़ ताक़त है ग़म-ए-हिज्र की बीमारी से बैठते उठते हैं आहों की मदद-गारी से हुस्न-ए-रुख़्सार बढ़ा ख़त की नुमूदारी से ज़ीनत-ए-सफ़हा हुई जदवल-ए-ज़ंगारी से तू जो तलवार से नहलाए लहू में मुझ को ग़ुस्ल-ए-सेह्हत हुआ भी इश्क़ की बीमारी से और तो तर्क किया सब ने शब-ए-फ़ुर्क़त में बेकसी बाज़ न आई मिरी ग़म-ख़्वारी से
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शोर करूँँगा और न कुछ भी बोलूँगा ख़ामोशी से अपना रोना रो लूँगा सारी उम्र इसी ख़्वाहिश में गुज़री है दस्तक होगी और दरवाज़ा खोलूँगा तन्हाई में ख़ुद से बातें करनी हैं मेरे मुँह में जो आएगा बोलूँगा रात बहुत है तुम चाहो तो सो जाओ मेरा क्या है मैं दिन में भी सो लूँगा तुम को दिल की बात बतानी है लेकिन आँखें बंद करो तो मुट्ठी खोलूँगा
Tehzeeb Hafi
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मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते इक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपना इक तुम हो कि अपनों को भी अपना नहीं कहते कम-हिम्मती ख़तरा है समुंदर के सफ़र में तूफ़ान को हम दोस्तो ख़तरा नहीं कहते बन जाए अगर बात तो सब कहते हैं क्या क्या और बात बिगड़ जाए तो क्या क्या नहीं कहते
Nawaz Deobandi
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तुम्हारा रंग दुनिया ने छुआ था तब कहाँ थे तुम? हमारा कैनवस ख़ाली पड़ा था तब कहाँ थे तुम? मेरे लशकर में शिरकत की इजाज़त माँगने वालो! मैं परचम थाम कर तन्हा खड़ा था तब कहाँ थे तुम? तुम्हारी दस्तकों पर रहम आता है मुझे लेकिन ये दरवाज़ा कई दिन से खुला था तब कहाँ थे तुम? फलों पर हक़ जताने आए हो तो ये भी बतला दो मैं जब पौधों को पानी दे रहा था तब कहाँ थे तुम? ये बस इक रस्मिया तफ़तीश है, आराम से बैठो वफ़ा का ख़ून जिस शब को हुआ था तब कहाँ थे तुम? मुआ'फ़ी चाहता हूँ अब तो बस ख़बरों से मतलब है मैं जब रूमानी फ़िल्में देखता था तब कहाँ थे तुम?
Zubair Ali Tabish
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इक ज़रा सा टूट कर मिस्मार हो जाता है क्या आईने का आईना बेकार हो जाता है क्या आज कल मायूस वापस आ रहे हैं क़ाफ़िले आज कल उस दर से भी इनकार हो जाता है क्या हाथ पाँव मारने से हो नहीं सकता अगर डूब जाने से समुंदर पार हो जाता है क्या आलम-ए-तन्हाई में भी उस का ऐसा ख़ौफ़ है ज़ेहन में होता है क्या इज़हार हो जाता है क्या हाए उस का इस क़दर मासूमियत से पूछना लड़कियों को लड़कियों से प्यार हो जाता है क्या
Zia Mazkoor
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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी
Kumar Vishwas
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सर कटा कर सिफ़त-ए-शम्अ' जो मर जाते हैं नाम रौशन वही आफ़ाक़ में कर जाते हैं लाखों का ख़ून बहाएँगे वो जब होंगे जवाँ जो लड़कपन में लहू देख के डर जाते हैं जुम्बिश-ए-तेग़-ए-निगह की नहीं हाजत असलन काम मेरा वो इशारों ही में कर जाते हैं उन को उश्शाक़ ही के दिल की नहीं है तख़सीस कोई शीशा हो परी बन के उतर जाते हैं बर्क़ की तरह से बेताब जो हैं ऐ 'नादिर' तार-घर किस की वो लेने को ख़बर जाते हैं
Kalb-E-Hussain Nadir
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दिल मुझे कुफ़्र आश्ना न करे बंदा बुत का हूँ मैं ख़ुदा न करे काटती है पतंग ग़ैरों की हम से तक्कल तिरे उड़ा न करे सुल्ह मंज़ूर है अगर तुम को आँख अग़्यार से लड़ा न करे क्यूँँ न आँचल दुपट्टे का लटके हो परी-ज़ाद पर लगा न करे है वो बुत अब तो महव-ए-यकताई डर ख़ुदा का न हो तो क्या न करे पढ़े 'नादिर' जो शेर-ए-तर्ज़-ए-जदीद सुन के क्यूँँ ख़ल्क़ वाह-वा न करे
Kalb-E-Hussain Nadir
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