शे'र मेरे कहाँ थे किसी के लिए मैं ने सब कुछ लिखा है तुम्हारे लिए अपने दुख सुख बहुत ख़ूब-सूरत रहे हम जिए भी तो इक दूसरे के लिए हम-सफ़र ने मिरा साथ छोड़ा नहीं अपने आँसू दिए रास्ते के लिए इस हवेली में अब कोई रहता नहीं चाँद निकला किसे देखने के लिए ज़िंदगी और मैं दो अलग तो नहीं मैं ने सब फूल काटे इसी से लिए शहर में अब मिरा कोई दुश्मन नहीं सब को अपना लिया मैं ने तेरे लिए ज़ेहन में तितलियाँ उड़ रही हैं बहुत कोई धागा नहीं बाँधने के लिए एक तस्वीर ग़ज़लों में ऐसी बनी अगले पिछले ज़मानों के चेहरे लिए
Related Ghazal
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
More from Bashir Badr
जब सहर चुप हो हँसा लो हम को जब अँधेरा हो जला लो हम को हम हक़ीक़त हैं नज़र आते हैं दास्तानों में छुपा लो हम को ख़ून का काम रवाँ रहना है जिस जगह चाहो बहा लो हम को दिन न पा जाए कहीं शब का राज़ सुब्ह से पहले उठा लो हम को हम ज़माने के सताए हैं बहुत अपने सीने से लगा लो हम को वक़्त के होंट हमें छू लेंगे अन-कहे बोल हैं गा लो हम को
Bashir Badr
1 likes
मिरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे ये चराग़ फिर भी चराग़ है कहीं तेरा हाथ जला न दे नए दौर के नए ख़्वाब हैं नए मौसमों के गुलाब हैं ये मोहब्बतों के चराग़ हैं इन्हें नफ़रतों की हवा न दे ज़रा देख चाँद की पत्तियों ने बिखर बिखर के तमाम शब तिरा नाम लिक्खा है रेत पर कोई लहर आ के मिटा न दे मैं उदासियाँ न सजा सकूँ कभी जिस्म-ओ-जाँ के मज़ार पर न दिए जलें मिरी आँख में मुझे इतनी सख़्त सज़ा न दे मिरे साथ चलने के शौक़ में बड़ी धूप सर पे उठाएगा तिरा नाक नक़्शा है मोम का कहीं ग़म की आग घुला न दे मैं ग़ज़ल की शबनमी आँख से ये दुखों के फूल चुना करूँँ मिरी सल्तनत मिरा फ़न रहे मुझे ताज-ओ-तख़्त ख़ुदा न दे
Bashir Badr
7 likes
पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है इक ज़ेहन-ए-परेशाँ में ख़्वाब-ए-ग़ज़लिस्ताँ है पत्थर की हिफ़ाज़त में शीशे की जवानी है दिल से जो छटे बादल तो आँख में सावन है ठहरा हुआ दरिया है बहता हुआ पानी है हम-रंग-ए-दिल-ए-पुर-ख़ूँ हर लाला-ए-सहराई गेसू की तरह मुज़्तर अब रात की रानी है जिस संग पे नज़रें कीं ख़ुर्शीद-ए-हक़ीक़त है जिस चाँद से मुँह मोड़ा पत्थर की कहानी है ऐ पीर-ए-ख़िरद-मंदाँ दिल की भी ज़रूरत है ये शहर-ए-ग़ज़ालाँ है ये मुल्क-ए-जवानी है ग़म वज्ह-ए-फ़िगार-ए-दिल ग़म वज्ह-ए-क़रार-ए-दिल आँसू कभी शीशा है आँसू कभी पानी है इस हौसला-ए-दिल पर हम ने भी कफ़न पहना हँस कर कोई पूछेगा क्या जान गँवानी है दिन तल्ख़ हक़ाएक़ के सहराओं का सूरज है शब गेसु-ए-अफ़्साना यादों की कहानी है वो हुस्न जिसे हम ने रुस्वा किया दुनिया में नादीदा हक़ीक़त है ना-गुफ़्ता कहानी है वो मिस्रा-ए-आवारा दीवानों पे भारी है जिस में तिरे गेसू की बे-रब्त कहानी है हम ख़ुशबू-ए-आवारा हम नूर-ए-परेशाँ हैं ऐ 'बद्र' मुक़द्दर में आशुफ़्ता-बयानी है
Bashir Badr
1 likes
वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिए बनाया है कहाँ से आई ये ख़ुशबू ये घर की ख़ुशबू है इस अजनबी के अँधेरे में कौन आया है महक रही है ज़मीं चाँदनी के फूलों से ख़ुदा किसी की मोहब्बत पे मुस्कुराया है उसे किसी की मोहब्बत का ए'तिबार नहीं उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है तमाम उम्र मिरा दिल उसी धुएँ में घुटा वो इक चराग़ था मैं ने उसे बुझाया है
Bashir Badr
5 likes
किसी की याद में पलकें ज़रा भिगो लेते उदास रात की तन्हाइयों में रो लेते दुखों का बोझ अकेले नहीं सँभलता है कहीं वो मिलता तो उस से लिपट के रो लेते अगर सफ़र में हमारा भी हम-सफ़र होता बड़ी ख़ुशी से उन्हीं पत्थरों पे सो लेते तुम्हारी राह में शाख़ों पे फूल सूख गए कभी हवा की तरह इस तरफ़ भी हो लेते ये क्या कि रोज़ वही चाँदनी का बिस्तर हो कभी तो धूप की चादर बिछा के सो लेते
Bashir Badr
13 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Bashir Badr.
Similar Moods
More moods that pair well with Bashir Badr's ghazal.







