ghazalKuch Alfaaz

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है इक ज़ेहन-ए-परेशाँ में ख़्वाब-ए-ग़ज़लिस्ताँ है पत्थर की हिफ़ाज़त में शीशे की जवानी है दिल से जो छटे बादल तो आँख में सावन है ठहरा हुआ दरिया है बहता हुआ पानी है हम-रंग-ए-दिल-ए-पुर-ख़ूँ हर लाला-ए-सहराई गेसू की तरह मुज़्तर अब रात की रानी है जिस संग पे नज़रें कीं ख़ुर्शीद-ए-हक़ीक़त है जिस चाँद से मुँह मोड़ा पत्थर की कहानी है ऐ पीर-ए-ख़िरद-मंदाँ दिल की भी ज़रूरत है ये शहर-ए-ग़ज़ालाँ है ये मुल्क-ए-जवानी है ग़म वज्ह-ए-फ़िगार-ए-दिल ग़म वज्ह-ए-क़रार-ए-दिल आँसू कभी शीशा है आँसू कभी पानी है इस हौसला-ए-दिल पर हम ने भी कफ़न पहना हँस कर कोई पूछेगा क्या जान गँवानी है दिन तल्ख़ हक़ाएक़ के सहराओं का सूरज है शब गेसु-ए-अफ़्साना यादों की कहानी है वो हुस्न जिसे हम ने रुस्वा किया दुनिया में नादीदा हक़ीक़त है ना-गुफ़्ता कहानी है वो मिस्रा-ए-आवारा दीवानों पे भारी है जिस में तिरे गेसू की बे-रब्त कहानी है हम ख़ुशबू-ए-आवारा हम नूर-ए-परेशाँ हैं ऐ 'बद्र' मुक़द्दर में आशुफ़्ता-बयानी है

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा आग से आग बुझा फूल खिला जाम उठा पी मिरे यार तुझे अपनी क़सम देता हूँ भूल जा शिकवा गिला हाथ मिला जाम उठा हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा देर क्या करना यहाँ हाथ बढ़ा जाम उठा प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ मय-कदे में कोई छोटा न बड़ा जाम उठा

Bashir Badr

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ख़ानदानी रिश्तों में अक्सर रक़ाबत है बहुत घर से निकलो तो ये दुनिया ख़ूब-सूरत है बहुत अपने कॉलेज में बहुत मग़रूर जो मशहूर है दिल मिरा कहता है उस लड़की में चाहत है बहुत उन के चेहरे चाँद तारों की तरह रौशन रहे जिन ग़रीबों के यहाँ हुस्न-ए-क़नाअत है बहुत हम से हो सकती नहीं दुनिया की दुनिया-दारियाँ इश्क़ की दीवार के साए में राहत है बहुत धूप की चादर मिरे सूरज से कहना भेज दे ग़ुर्बतों का दौर है जाड़ों की शिद्दत है बहुत इन अँधेरों में जहाँ सहमी हुई थी ये ज़मीं रात से तन्हा लड़ा जुगनू में हिम्मत है बहुत

Bashir Badr

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शाम आँखों में आँख पानी में और पानी सरा-ए-फ़ानी में झिलमिलाते हैं कश्तियों में दिए पुल खड़े सो रहे हैं पानी में ख़ाक हो जाएगी ज़मीन इक दिन आसमानों की आसमानी में वो हवा है उसे कहाँ ढूँडूँ आग में ख़ाक में कि पानी में आ पहाड़ों की तरह सामने आ इन दिनों मैं भी हूँ रवानी में

Bashir Badr

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फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है मुझे सहरस नई एक शाम लेना है किसे ख़बर कि फ़रिश्ते ग़ज़ल समझते हैं ख़ुदा के सामने काफ़िर का नाम लेना है मुआ'मला है तिरा बदतरीन दुश्मन से मिरे अज़ीज़ मोहब्बत से काम लेना है महकती ज़ुल्फ़ों से ख़ुशबू चमकती आँख से धूप शबों से जाम-ए-सहर का सलाम लेना है तुम्हारी चाल की आहिस्तगी के लहजे में सुख़न से दिल को मसलने का काम लेना है नहीं मैं 'मीर' के दर पर कभी नहीं जाता मुझे ख़ुदा से ग़ज़ल का कलाम लेना है बड़े सलीक़े से नोटों में उस को तुल्वा कर अमीर-ए-शहरस अब इंतिक़ाम लेना है

Bashir Badr

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उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँख मलते हैं तमाम रात खुजूरों के पेड़ जुलते हैं मैं शाहराह नहीं रास्ते का पत्थर हूँ यहाँ सवार भी पैदल उतर के चलते हैं उन्हें कभी न बताना मैं उन की आँखों में वो लोग फूल समझ कर मुझे मसलते हैं कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से कहीं भी जाऊँ मिरे साथ साथ चलते हैं ये एक पेड़ है आ इस से मिल के रो लें हम यहाँ से तेरे मिरे रास्ते बदलते हैं

Bashir Badr

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