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sitaron se aage jahan aur bhi hain abhi ishq ke imtihan aur bhi hain tahi zindagi se nahin ye fazaen yahan saikdon karvan aur bhi hain qanaat na kar alam-e-rang-o-bu par chaman aur bhi ashiyan aur bhi hain agar kho gaya ik nasheman to kya ghham maqamat-e-ah-o-fughhan aur bhi hain tu shahin hai parvaz hai kaam tera tire samne asman aur bhi hain isi roz o shab men ulajh kar na rah ja ki tere zaman o makan aur bhi hain gae din ki tanha tha main anjuman men yahan ab mire raz-dan aur bhi hain sitaron se aage jahan aur bhi hain abhi ishq ke imtihan aur bhi hain tahi zindagi se nahin ye fazaen yahan saikdon karwan aur bhi hain qanaat na kar aalam-e-rang-o-bu par chaman aur bhi aashiyan aur bhi hain agar kho gaya ek nasheman to kya gham maqamat-e-ah-o-fughan aur bhi hain tu shahin hai parwaz hai kaam tera tere samne aasman aur bhi hain isi roz o shab mein ulajh kar na rah ja ki tere zaman o makan aur bhi hain gae din ki tanha tha main anjuman mein yahan ab mere raaz-dan aur bhi hain

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए जहाँ है तेरे लिए तू नहीं जहाँ के लिए ये अक़्ल ओ दिल हैं शरर शोला-ए-मोहब्बत के वो ख़ार-ओ-ख़स के लिए है ये नीस्ताँ के लिए मक़ाम-ए-परवरिश-ए-आह-ओ-लाला है ये चमन न सैर-ए-गुल के लिए है न आशियाँ के लिए रहेगा रावी ओ नील ओ फ़ुरात में कब तक तिरा सफ़ीना कि है बहर-ए-बे-कराँ के लिए निशान-ए-राह दिखाते थे जो सितारों को तरस गए हैं किसी मर्द-ए-राह-दाँ के लिए निगह बुलंद सुख़न दिल-नवाज़ जाँ पुर-सोज़ यही है रख़्त-ए-सफ़र मीर-ए-कारवाँ के लिए ज़रा सी बात थी अंदेशा-ए-अजम ने उसे बढ़ा दिया है फ़क़त ज़ेब-ए-दास्ताँ के लिए मिरे गुलू में है इक नग़्मा जिब्राईल-आशोब सँभाल कर जिसे रक्खा है ला-मकाँ के लिए

Allama Iqbal

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अक़्ल गो आस्ताँ से दूर नहीं उस की तक़दीर में हुज़ूर नहीं दिल-ए-बीना भी कर ख़ुदा से तलब आँख का नूर दिल का नूर नहीं इल्म में भी सुरूर है लेकिन ये वो जन्नत है जिस में हूर नहीं क्या ग़ज़ब है कि इस ज़माने में एक भी साहब-ए-सुरूर नहीं इक जुनूँ है कि बा-शुऊर भी है इक जुनूँ है कि बा-शुऊर नहीं ना-सुबूरी है ज़िंदगी दिल की आह वो दिल कि ना-सुबूर नहीं बे-हुज़ूरी है तेरी मौत का राज़ ज़िंदा हो तू तो बे-हुज़ूर नहीं हर गुहर ने सदफ़ को तोड़ दिया तू ही आमादा-ए-ज़ुहूर नहीं अरिनी मैं भी कह रहा हूँ मगर ये हदीस-ए-कलीम-ओ-तूर नहीं

Allama Iqbal

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ला फिर इक बार वही बादा ओ जाम ऐ साक़ी हाथ आ जाए मुझे मेरा मक़ाम ऐ साक़ी तीन सौ साल से हैं हिन्द के मय-ख़ाने बंद अब मुनासिब है तिरा फ़ैज़ हो आम ऐ साक़ी मेरी मीना-ए-ग़ज़ल में थी ज़रा सी बाक़ी शेख़ कहता है कि है ये भी हराम ऐ साक़ी शे'र मर्दों से हुआ बेश-ए-तहक़ीक़ तही रह गए सूफ़ी ओ मुल्ला के ग़ुलाम ऐ साक़ी इश्क़ की तेग़-ए-जिगर-दार उड़ा ली किस ने इल्म के हाथ में ख़ाली है नियाम ऐ साक़ी सीना रौशन हो तो है सोज़-ए-सुख़न ऐन-ए-हयात हो न रौशन तो सुख़न मर्ग-ए-दवाम ऐ साक़ी तू मिरी रात को महताब से महरूम न रख तिरे पैमाने में है माह-ए-तमाम ऐ साक़ी

Allama Iqbal

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अफ़्लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर करते हैं ख़िताब आख़िर उठते हैं हिजाब आख़िर अहवाल-ए-मोहब्बत में कुछ फ़र्क़ नहीं ऐसा सोज़ ओ तब-ओ-ताब अव्वल सोज़ ओ तब-ओ-ताब आख़िर मैं तुझ को बताता हूँ तक़दीर-ए-उमम क्या है शमशीर-ओ-सिनाँ अव्वल ताऊस-ओ-रुबाब आख़िर मय-ख़ाना-ए-यूरोप के दस्तूर निराले हैं लाते हैं सुरूर अव्वल देते हैं शराब आख़िर क्या दबदबा-ए-नादिर क्या शौकत-ए-तैमूरी हो जाते हैं सब दफ़्तर ग़र्क़-ए-मय-ए-नाब आख़िर ख़ल्वत की घड़ी गुज़री जल्वत की घड़ी आई छुटने को है बिजली से आग़ोश-ए-सहाब आख़िर था ज़ब्त बहुत मुश्किल इस सैल-ए-मआ'नी का कह डाले क़लंदर ने असरार-ए-किताब आख़िर

Allama Iqbal

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तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ सितम हो कि हो वादा-ए-बे-हिजाबी कोई बात सब्र-आज़मा चाहता हूँ ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को कि मैं आप का सामना चाहता हूँ ज़रा सा तो दिल हूँ मगर शोख़ इतना वही लन-तरानी सुना चाहता हूँ कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहल-ए-महफ़िल चराग़-ए-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी बड़ा बे-अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ

Allama Iqbal

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