ghazalKuch Alfaaz

सुकूँ से रात बिताते थे मौज करते थे जब उस के ख़्वाब न आते थे मौज करते थे फ़ुज़ूल आ गए सहरा से शहर में हम लोग वहाँ पे ख़ाक उड़ाते थे मौज करते थे घिरे हुए हैं ज़माने के अब अज़ाबों से ये लोग नाचते गाते थे मौज करते थे किसी के रंग में ढलने से हो गए बे-रंग हम अपने रंग बनाते थे मौज करते थे अमीर-ए-शहर के पकवान से हुए बीमार नमक से रोटियाँ खाते थे मौज करते थे हम उस की बज़्म में ताख़ीर से गए हर बार जो लोग वक़्त पे आते थे मौज करते थे

Varun Anand16 Likes

Related Ghazal

जाम सिगरेट कश और बस कुछ धुआँ आख़िरश और बस मौत तक ज़िंदगी का सफ़र रात-दिन कश्मकश और बस पी गया पेड़ आँधी मगर गिर पड़ा खा के ग़श और बस ज़िंदगी जलती सिगरेट है सिर्फ़ दो-चार कश और बस सूखते पेड़ की लकड़ियाँ आख़िरी पेशकश और बस

Sandeep Thakur

50 likes

ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

102 likes

सो रहेंगे के जागते रहेंगे हम तेरे ख़्वाब देखते रहेंगे तू कही और ही ढूंढता रहेंगा हम कही और ही खिले रहेंगे राहगीरों ने राह बदलनी है पेड़ अपनी जगह खड़े रहेंगे सभी मौसम है दस्तरस में तेरी तू ने चाहा तो हम हरे रहेंगे लौटना कब है तू ने पर तुझ को आदतन ही पुकारते रहेंगे तुझ को पाने में मसअला ये है तुझ को खोने के वसवसे रहेंगे तू इधर देख मुझ सेे बातें कर यार चश्में तो फूटते रहेंगे एक मुद्दत हुई है तुझ सेे मिले तू तो कहता था राब्ते रहेंगे

Tehzeeb Hafi

91 likes

कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

88 likes

क्या कहेगा कभी मिलने भी अगर आएगा वो अब वफ़ादारी की क़स्में तो नहीं खाएगा वो हम समझते थे कि हम उस को भुला सकते हैं वो समझता था हमें भूल नहीं पाएगा वो कितना सोचा था पर इतना तो नहीं सोचा था याद बन जाएगा वो ख़्वाब नज़र आएगा वो सब के होते हुए इक रोज़ वो तन्हा होगा फिर वो ढूँढेगा हमें और नहीं पाएगा वो इत्तिफ़ाक़न जो कभी सामने आया 'अजमल' अब वो तन्हा तो न होगा जो ठहर जाएगा वो

Ajmal Siraj

50 likes

More from Varun Anand

कहीं न ऐसा हो अपना वक़ार खा जाए ख़िज़ाँ से फूल बचाएँ बहार खा जाए हमारे जैसा कहाँ दिल किसी का होगा भला जो दर्द पाले रखे और क़रार खा जाए पलट के संग तिरी और फेंक सकता हूँ कि मैं वो क़ैस नहीं हाँ जो मार खा जाए उसी का दाख़िला इस दश्त में करो अब से जो सब्र पी सके अपना ग़ुबार खा जाए बहुत क़रार है थोड़ी सी बे-क़रारी दे कहीं न ऐसा हो मुझ को क़रार खा जाए अजब सफ़ीना है ये वक़्त का सफ़ीना भी जो अपनी गोद में बैठा सवार खा जाए

Varun Anand

11 likes

ये शोख़ियाँ ये जवानी कहाँ से लाएँ हम तुम्हारे हुस्न का सानी कहाँ से लाएँ हम मोहब्बतें वो पुरानी कहाँ से लाएँ हम रुकी नदी में रवानी कहाँ से लाएँ हम हमारी आँख है पैवस्त एक सहरा में अब ऐसी आँख में पानी कहाँ से लाएँ हम हर एक लफ़्ज़ के मा'नी तलाशते हो तुम हर एक लफ़्ज़ का मा'नी कहाँ से लाएँ हम चलो बता दें ज़माने को अपने बारे में कि रोज़ झूटी कहानी कहाँ से लाएँ हम

Varun Anand

13 likes

कहीं न ऐसा हो अपना वक़ार खा जाए ख़िज़ाँ से फूल बचाएँ बहार खा जाए हमारे जैसा कहाँ दिल किसी का होगा भला जो दर्द पाले रखे और क़रार खा जाए पलट के संग तिरी और फेंक सकता हूँ कि मैं वो क़ैस नहीं हाँ जो मार खा जाए उसी का दाख़िला इस दश्त में करो अब से जो सब्र पी सके अपना ग़ुबार खा जाए बहुत क़रार है थोड़ी सी बे-क़रारी दे कहीं न ऐसा हो मुझ को क़रार खा जाए अजब सफ़ीना है ये वक़्त का सफ़ीना भी जो अपनी गोद में बैठा सवार खा जाए

Varun Anand

21 likes

मरहम के नहीं हैं ये तरफ़-दार नमक के निकले हैं मिरे ज़ख़्म तलबगार नमक के आया कोई सैलाब कहानी में अचानक और घुल गए पानी में वो किरदार नमक के दोनों ही किनारों पे थी बीमारों की मज्लिस इस पार थे मीठे के तो उस पार नमक के उस ने ही दिए ज़ख़्म ये गर्दन पे हमारी फिर उस ने ही पहनाए हमें हार नमक के कहती थी ग़ज़ल मुझ को है मरहम की ज़रूरत और देते रहे सब उसे अश'आर नमक के जिस सम्त मिला करती थीं ज़ख़्मों की दवाएँ सुनते हैं कि अब हैं वहाँ बाज़ार नमक के

Varun Anand

9 likes

इसीलिए तो मुसाफ़िर तू सोगवार नहीं कि तू ने क़ाफ़िले देखे हैं पर गुबार नहीं नहीं ये बात नहीं है कि तुझ से प्यार नहीं मैं क्या करूँँ कि मुझे ख़ुद का ए'तिबार नहीं लगा हूँ हाथ जो तेरे तो अब सँभाल मुझे मैं एक बार ही मिलता हूँ बार-बार नहीं मुझे कुरेदने वालो मैं एक सहरा हूँ कि मुझ सेे रेत ही निकलेगी आबशार नहीं ग़मों से रिश्ता बना दोस्ती निभा इनसे दुखों को पाल मेरी जान इनको मार नहीं मिरे क़ुबूल पे उस ने क़ुबूल कह तो दिया पर एक बार कहा उस ने तीन बार नहीं जहाँ तू बिछड़ा वहाँ गीत बज रहा था यही "मिरे नसीब में ऐ दोस्त तेरा प्यार नहीं"

Varun Anand

20 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Varun Anand.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Varun Anand's ghazal.