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सुनने में आया है मेरा चर्चा नइँ था मुझ को जितना लगता था मैं उतना नइँ था उस को अच्छे लगते थे सब छैल छबीले हम जैसों को उस सेे कोई ख़तरा नइँ था सादा दिल थे सो हम अपने ही दुश्मन थे वो भी अच्छा लगता था जो अच्छा नइँ था शर्मीले साजन की सब बेशर्मी देखी सब कुछ सोचा करता था वो कहता नइँ था अच्छी सूरत कितनी अच्छी हो सकती थी लेकिन तब तक मैं ने उस को देखा नइँ था

Vishal Bagh12 Likes

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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ख़बर सुन कर वो ये इतरा रहा है मुझे उस का बिछोड़ा खा रहा है मेरे सय्याद को कोई बुला दो मेरे पिंजरे को तोड़ा जा रहा है निकलना है हमें कब से सफ़र पर मगर ये जिस्म आड़े आ रहा है मैं उस को याद भी करना न चाहूँ वो आ कर ख़्वाब में उकसा रहा है चलो उस को अज़ीयत से निकालें सुना है अब भी वो पछता रहा है

Vishal Bagh

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वो जो लिखा है सब किताबों में वो ही शामिल नहीं निसाबों में उस की तासीर ऐसे काटी है हम ने घोला उसे शराबों में ये मेरी हिचकियाँ बताती हैं मैं बक़ाया हूँ कुछ हिसाबों में तो कोई तजरबा ही कर लें क्या कुछ नहीं मिल रहा किताबों में हम उसे यूँ ही मिल गए होते उस ने ढूँढ़ा नहीं ख़राबों में आओ और आ के फिर बिछड़ जाओ कुछ इज़ाफ़ा करो 'अज़ाबों में

Vishal Bagh

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जी हमी हैं मुहब्बत के मारे हुए दिल के टूटे हुए जाँ से हारे हुए जिन से बरसों की पहचान थी छुट गई अजनबी आज से हम तुम्हारे हुए इस ज़मीं को भी हम रास आए नहीं हम वही हैं फ़लक से उतारे हुए एक दिन आई दुनिया लिए अपने ग़म हम भी बैठे थे दामन पसारे हुए दिल जो टूटे नहीं ख़ाक में मिल गए दिल जो टूटे फ़लक के सितारे हुए दोष सारा हमारे जुनूँ को न दो उन की जानिब से भी कुछ इशारे हुए इक नज़र के तक़ाज़े पे सब ने कहा हम तुम्हारे हुए हम तुम्हारे हुए

Vishal Bagh

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अपनी मर्ज़ी से कुछ चुनूँगा मैं हर अदा पर नहीं मरूँगा मैं वो अगर ऐसे देख ले मुझ को उस को अच्छा नहीं लगूँगा मैं बाग़ में दिल नहीं लगा अब के अगले मौसम नहीं खिलूँगा मैं उस सेे आगे नहीं निकलना पर उस के पीछे नहीं चलूँगा मैं कह गए थे वो याद रक्खेंगे याद ही तो नहीं रहूँगा मैं

Vishal Bagh

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जब वो बोले कि कोई प्यारा था उन का मेरी तरफ़ इशारा था हम निकल आए जिस्म से बाहर उस ने कुछ इस तरह पुकारा था फेर देता था वो नज़र अपनी हर नज़र का यही उतारा था डूब जाना ही ठीक था मेरा मेरे दोनों तरफ़ किनारा था आख़िरश बोझ हो गया देखो मुझ को जो जिस्म जाँ से प्यारा था

Vishal Bagh

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