तमाम मुद्दत मिरा ये शिकवा रहा किरन से कि उस ने मुझ पर नज़र न डाली कभी गगन से मैं ज़िंदगी का दिया जला कर के जिऊँ ही पल्टा तभी अचानक हवाएँ चल दीं क़ज़ा के बन से पुरानी चाहत के ज़ख़्म अब तक भरे नहीं हैं और एक लड़की पड़ी है पीछे बड़े जतन से वो माह-पारा मिलन से पहले बहुत ख़फ़ा थी अब उस के बोसे छुटा रहा हूँ मैं इस बदन से मुझे असीरी में लुत्फ़ आने लगा था यारो मैं धुन बनाता था बेड़ियों की खनन खनन से
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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मुझ में कितने राज़ हैं बतलाऊँ क्या बंद एक मुद्दत से हूँ खुल जाऊँ क्या आजिज़ी मिन्नत ख़ुशामद इल्तिजा और मैं क्या क्या करूँँ मर जाऊँ क्या तेरे जलसे में तेरा परचम लिए सैकड़ों लाशें भी हैं गिनवाऊँ क्या कल यहाँ मैं था जहाँ तुम आज हो मैं तुम्हारी ही तरह इतराऊँ क्या एक पत्थर है वो मेरी राह का गर न ठुकराऊँ तो ठोकर खाऊँ क्या फिर जगाया तू ने सोए शे'र को फिर वही लहजा दराज़ी आऊँ क्या
Rahat Indori
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ये किस तरह का तअ'ल्लुक़ है आप का मेरे साथ मुझे ही छोड़ के जाने का मशवरा मेरे साथ यही कहीं हमें रस्तों ने बद-दुआ दी थी मगर मैं भूल गया और कौन था मेरे साथ वो झाँकता नहीं खिड़की से दिन निकलता है तुझे यक़ीन नहीं आ रहा तो आ मेरे साथ
Tehzeeb Hafi
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बस इक निगाह-ए-नाज़ को तरसा हुआ था मैं हालांकि शहर-शहर में फैला हुआ था मैं मुद्दत के बा'द आइना देखा तो रो पड़ा किस बेहतरीन दोस्त से रूठा हुआ था मैं पहना जो रेनकोट तो बारिश नहीं हुई लौटा जो घर तो शर्म से भीगा हुआ था मैं पहले भी दी गई थी मुझे बज़्म की दुआ पहले भी इस दुआ पे अकेला हुआ था मैं कितनी अजीब बात है ना! तू ही आ गया! तेरे ही इंतिज़ार में बैठा हुआ था मैं
Zubair Ali Tabish
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ज़मीन अपनी है और ईंट गारा उस का है मकान-ए-इश्क़ में हिस्सा हमारा उस का है मैं ये जो साथ लिए फिरता हूँ ख़ज़ाना-ए-इश्क़ अगर वो हाथ उठा दे तो सारा उस का है शुरुअ दिन से ही मैं जंग का मुख़ालिफ़ था मगर मैं क्या करूँँ अब के इशारा उस का है वो दोस्त जिस सेे कि अब बात भी नहीं होती अगर मैं गिर पड़ूँ पहला सहारा उस का है
Ashu Mishra
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अब और दम न घुटे रौशनी का कमरे में दरीचे वा हों उजालों की दौड़ पूरी हो जो ख़्वाब आएँ तो देखूँ तुझे मैं जी-भर के कि नींद आए तो ख़्वाबों की दौड़ पूरी हो कोई बढ़ाए ज़रा आसमान की वुसअ'त मैं चाहता हूँ परिंदों की दौड़ पूरी हो किसी अज़ाब से रुक जाए रक़्स क़ातिल का घरों को लौटते बच्चों की दौड़ पूरी हो मैं तेरे हिज्र के आलम में जी नहीं सकता सो अब यही हो कि साँसों की दौड़ पूरी हो
Ashu Mishra
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ऐसे खुलते हैं फ़लक पर ये सितारे शब के जिस तरह फूल हों सारे ये बहार-ए-शब के तेरी तस्वीर बना कर तिरी ज़ुल्फ़ों के लिए हम ने काग़ज़ पे कई रंग उतारे शब के वो मुसव्विर जो बनाता है सहर का चेहरा उस से कहना कि अभी दर्द उभारे शब के क्या किसी शख़्स की हिजरत में जली हैं रातें क्यूँँ शरारों से चमकते हैं सितारे शब के ये तिरे हिज्र ने तोहफ़े में दिए हैं हम को ये जो मा'सूम से रिश्ते हैं हमारे शब के एक मुद्दत से हमें नींद न आई 'आशू' उम्र इक काट दी हम ने भी सहारे शब के
Ashu Mishra
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सुर आप के बिल्कुल मेरी लय से नहीं मिलते बस इस लिए हम मिलने के जैसे नहीं मिलते अलगाव का दुख दाइमी दुख है तो मेरी जान लेकिन ये मज़े दूसरी शय से नहीं मिलते होंठों पे रखा रह गया इनकार-ए-मुलाक़ात जब उस ने कहा देखूँगी कैसे नहीं मिलते अवल्ल तो मुहब्बत में मेरा जी नहीं लगता और दूसरा इस काम के पैसे नहीं मिलते
Ashu Mishra
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कोई आ कर नहीं जाता दिलों के आशियानों से रिहाई का कोई रस्ता नहीं इन क़ैद-ख़ानों से ज़मीं वालों ने जब से आसमाँ की ओर देखा है परिंदे ख़ौफ़ खाने लग गए ऊँची उड़ानों से मछेरे कश्तियों में बैठ कर के गा रहे हैं गीत हवाएँ मुस्कुरा कर मिल रही हैं बादबानों से ये सूखे ज़ख़्म हैं या रंग हैं तस्वीर माज़ी के मुझे गुज़रे ज़माने याद आए इन निशानों से हमें अपनी लड़ाई इस ज़मीं पर ख़ुद ही लड़नी है फ़रिश्ते तो नहीं आने यहाँ पर आसमानों से तुम्हारा दिल यहाँ पर खो गया तो कैसी हैरत है बरेली में तो झुमके तक निकल जाते हैं कानों से
Ashu Mishra
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