ghazalKuch Alfaaz

ज़मीन अपनी है और ईंट गारा उस का है मकान-ए-इश्क़ में हिस्सा हमारा उस का है मैं ये जो साथ लिए फिरता हूँ ख़ज़ाना-ए-इश्क़ अगर वो हाथ उठा दे तो सारा उस का है शुरुअ दिन से ही मैं जंग का मुख़ालिफ़ था मगर मैं क्या करूँँ अब के इशारा उस का है वो दोस्त जिस सेे कि अब बात भी नहीं होती अगर मैं गिर पड़ूँ पहला सहारा उस का है

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ऐसे खुलते हैं फ़लक पर ये सितारे शब के जिस तरह फूल हों सारे ये बहार-ए-शब के तेरी तस्वीर बना कर तिरी ज़ुल्फ़ों के लिए हम ने काग़ज़ पे कई रंग उतारे शब के वो मुसव्विर जो बनाता है सहर का चेहरा उस से कहना कि अभी दर्द उभारे शब के क्या किसी शख़्स की हिजरत में जली हैं रातें क्यूँँ शरारों से चमकते हैं सितारे शब के ये तिरे हिज्र ने तोहफ़े में दिए हैं हम को ये जो मा'सूम से रिश्ते हैं हमारे शब के एक मुद्दत से हमें नींद न आई 'आशू' उम्र इक काट दी हम ने भी सहारे शब के

Ashu Mishra

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अब और दम न घुटे रौशनी का कमरे में दरीचे वा हों उजालों की दौड़ पूरी हो जो ख़्वाब आएँ तो देखूँ तुझे मैं जी-भर के कि नींद आए तो ख़्वाबों की दौड़ पूरी हो कोई बढ़ाए ज़रा आसमान की वुसअ'त मैं चाहता हूँ परिंदों की दौड़ पूरी हो किसी अज़ाब से रुक जाए रक़्स क़ातिल का घरों को लौटते बच्चों की दौड़ पूरी हो मैं तेरे हिज्र के आलम में जी नहीं सकता सो अब यही हो कि साँसों की दौड़ पूरी हो

Ashu Mishra

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सुर आप के बिल्कुल मेरी लय से नहीं मिलते बस इस लिए हम मिलने के जैसे नहीं मिलते अलगाव का दुख दाइमी दुख है तो मेरी जान लेकिन ये मज़े दूसरी शय से नहीं मिलते होंठों पे रखा रह गया इनकार-ए-मुलाक़ात जब उस ने कहा देखूँगी कैसे नहीं मिलते अवल्ल तो मुहब्बत में मेरा जी नहीं लगता और दूसरा इस काम के पैसे नहीं मिलते

Ashu Mishra

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दिल की तरह ही अब मिरी दुनिया ख़राब है सो अपना हाल इन दिनों अच्छा ख़राब है आँसू बहे तो यूँँ हुआ बीनाई बढ़ गई फिर साफ़ साफ़ दिख गया क्या क्या ख़राब है पहले-पहल तो मैं तिरा यक-तरफ़ा इश्क़ था अब मेरा हाल तुझ से ज़ियादा ख़राब है दुनिया से तंग शख़्स को अच्छी है ख़ुद-कुशी ग़र्क़ाब होते शख़्स को तिनका ख़राब है तो इश्क़ से मिटाएँगे दुनिया की नफ़रतें 'मिश्रा' जी आप ठीक हैं माथा ख़राब है

Ashu Mishra

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उस की क़ुर्बत में हुआ है ये ख़सारा मेरा आप पढ़ लीजिए हर आँख में क़िस्सा मेरा हर नई साँस पे बनता हूँ बिगड़ जाता हूँ ये हवा ख़त्म ही कर दे न तमाशा मेरा अब तो होंटों पे कभी फूल भी खिल जाते हैं आप ने इन दिनों देखा नहीं चेहरा मेरा मैं ने रो रो के उसे ग़ैर का होने न दिया उस बला-ख़ेज़ को ज़ंजीर था गिर्या मेरा अब नए दश्त मुझे देख के डर जाते हैं मेरी वहशत ने बढ़ा रक्खा है रुत्बा मेरा

Ashu Mishra

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