ghazalKuch Alfaaz

कोई आ कर नहीं जाता दिलों के आशियानों से रिहाई का कोई रस्ता नहीं इन क़ैद-ख़ानों से ज़मीं वालों ने जब से आसमाँ की ओर देखा है परिंदे ख़ौफ़ खाने लग गए ऊँची उड़ानों से मछेरे कश्तियों में बैठ कर के गा रहे हैं गीत हवाएँ मुस्कुरा कर मिल रही हैं बादबानों से ये सूखे ज़ख़्म हैं या रंग हैं तस्वीर माज़ी के मुझे गुज़रे ज़माने याद आए इन निशानों से हमें अपनी लड़ाई इस ज़मीं पर ख़ुद ही लड़नी है फ़रिश्ते तो नहीं आने यहाँ पर आसमानों से तुम्हारा दिल यहाँ पर खो गया तो कैसी हैरत है बरेली में तो झुमके तक निकल जाते हैं कानों से

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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ज़मीन अपनी है और ईंट गारा उस का है मकान-ए-इश्क़ में हिस्सा हमारा उस का है मैं ये जो साथ लिए फिरता हूँ ख़ज़ाना-ए-इश्क़ अगर वो हाथ उठा दे तो सारा उस का है शुरुअ दिन से ही मैं जंग का मुख़ालिफ़ था मगर मैं क्या करूँँ अब के इशारा उस का है वो दोस्त जिस सेे कि अब बात भी नहीं होती अगर मैं गिर पड़ूँ पहला सहारा उस का है

Ashu Mishra

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ऐसे खुलते हैं फ़लक पर ये सितारे शब के जिस तरह फूल हों सारे ये बहार-ए-शब के तेरी तस्वीर बना कर तिरी ज़ुल्फ़ों के लिए हम ने काग़ज़ पे कई रंग उतारे शब के वो मुसव्विर जो बनाता है सहर का चेहरा उस से कहना कि अभी दर्द उभारे शब के क्या किसी शख़्स की हिजरत में जली हैं रातें क्यूँँ शरारों से चमकते हैं सितारे शब के ये तिरे हिज्र ने तोहफ़े में दिए हैं हम को ये जो मा'सूम से रिश्ते हैं हमारे शब के एक मुद्दत से हमें नींद न आई 'आशू' उम्र इक काट दी हम ने भी सहारे शब के

Ashu Mishra

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तमाम मुद्दत मिरा ये शिकवा रहा किरन से कि उस ने मुझ पर नज़र न डाली कभी गगन से मैं ज़िंदगी का दिया जला कर के जिऊँ ही पल्टा तभी अचानक हवाएँ चल दीं क़ज़ा के बन से पुरानी चाहत के ज़ख़्म अब तक भरे नहीं हैं और एक लड़की पड़ी है पीछे बड़े जतन से वो माह-पारा मिलन से पहले बहुत ख़फ़ा थी अब उस के बोसे छुटा रहा हूँ मैं इस बदन से मुझे असीरी में लुत्फ़ आने लगा था यारो मैं धुन बनाता था बेड़ियों की खनन खनन से

Ashu Mishra

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लाखों की भीड़ में भी कोई हम-नफ़स न हो अल्लाह तेरी ख़ल्क़ का मतलब क़फ़स न हो रंग-ए-जमाल-ए-इश्क़ से कूँची भरी हो पर तस्वीर खींचने के लिए कैनवस न हो कहिए कि कैसे दिल लगे ऐसी जगह जहाँ बातें तो बे-हिसाब हों बातों में रस न हो मैं इश्क़ कर रहा हूँ मगर सोचता भी हूँ पिछले बरस जो हो चुका अब के बरस न हो हैरत है एक उम्र की बारिश के बावजूद आँखों में कोई शक्ल है जो टस से मस न हो 'मिश्रा' जी ऐसे शख़्स से रहते हैं दूर-दूर जिस में कि रंग-ए-इश्क़ हो रंग-ए-हवस न हो

Ashu Mishra

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अब और दम न घुटे रौशनी का कमरे में दरीचे वा हों उजालों की दौड़ पूरी हो जो ख़्वाब आएँ तो देखूँ तुझे मैं जी-भर के कि नींद आए तो ख़्वाबों की दौड़ पूरी हो कोई बढ़ाए ज़रा आसमान की वुसअ'त मैं चाहता हूँ परिंदों की दौड़ पूरी हो किसी अज़ाब से रुक जाए रक़्स क़ातिल का घरों को लौटते बच्चों की दौड़ पूरी हो मैं तेरे हिज्र के आलम में जी नहीं सकता सो अब यही हो कि साँसों की दौड़ पूरी हो

Ashu Mishra

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