ghazalKuch Alfaaz

tang aa chuke hain kashmakash-e-zindagi se ham thukra na den jahan ko kahin be-dili se ham mayusi-e-maal-e-mohabbat na puchhiye apnon se pesh aae hain beganagi se ham lo aaj ham ne tod diya rishta-e-umid lo ab kabhi gila na karenge kisi se ham ubhrenge ek baar abhi dil ke valvale go dab gae hain bar-e-ghham-e-zindagi se ham gar zindagi men mil gae phir ittifaq se puchhenge apna haal tiri bebasi se ham allah-re fareb-e-mashiyyat ki aaj tak duniya ke zulm sahte rahe khamushi se ham tang aa chuke hain kashmakash-e-zindagi se hum thukra na den jahan ko kahin be-dili se hum mayusi-e-maal-e-mohabbat na puchhiye apnon se pesh aae hain beganagi se hum lo aaj hum ne tod diya rishta-e-umid lo ab kabhi gila na karenge kisi se hum ubhrenge ek bar abhi dil ke walwale go dab gae hain bar-e-gham-e-zindagi se hum gar zindagi mein mil gae phir ittifaq se puchhenge apna haal teri bebasi se hum allah-re fareb-e-mashiyyat ki aaj tak duniya ke zulm sahte rahe khamushi se hum

Related Ghazal

सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

140 likes

पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

158 likes

हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

102 likes

इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

95 likes

उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

Tehzeeb Hafi

220 likes

More from Sahir Ludhianvi

सदियों से इंसान ये सुनता आया है दुख की धूप के आगे सुख का साया है हम को इन सस्ती ख़ुशियों का लोभ न दो हम ने सोच समझ कर ग़म अपनाया है झूट तो क़ातिल ठहरा इस का क्या रोना सच ने भी इंसाँ का ख़ूँ बहाएा है पैदाइश के दिन से मौत की ज़द में हैं इस मक़्तल में कौन हमें ले आया है अव्वल अव्वल जिस दिल ने बर्बाद किया आख़िर आख़िर वो दिल ही काम आया है इतने दिन एहसान किया दीवानों पर जितने दिन लोगों ने साथ निभाया है

Sahir Ludhianvi

14 likes

देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से ऐ रूह-ए-अस्र जाग कहाँ सो रही है तू आवाज़ दे रहे हैं पयम्बर सलीब से इस रेंगती हयात का कब तक उठाएँ बार बीमार अब उलझने लगे हैं तबीब से हर गाम पर है मजमा-ए-उश्शाक़ मुंतज़िर मक़्तल की राह मिलती है कू-ए-हबीब से इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से

Sahir Ludhianvi

3 likes

दूर रह कर न करो बात क़रीब आ जाओ याद रह जाएगी ये रात क़रीब आ जाओ एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने की आज बस में नहीं जज़्बात क़रीब आ जाओ सर्द झोंकों से भड़कते हैं बदन में शो'ले जान ले लेगी ये बरसात क़रीब आ जाओ इस क़दर हम से झिजकने की ज़रूरत क्या है ज़िंदगी भर का है अब साथ क़रीब आ जाओ

Sahir Ludhianvi

7 likes

भूले से मोहब्बत कर बैठा, नादाँ था बेचारा, दिल ही तो है हर दिल से ख़ता हो जाती है, बिगड़ो न ख़ुदारा, दिल ही तो है इस तरह निगाहें मत फेरो, ऐसा न हो धड़कन रुक जाए सीने में कोई पत्थर तो नहीं एहसास का मारा, दिल ही तो है जज़्बात भी हिन्दू होते हैं चाहत भी मुसलमाँ होती है दुनिया का इशारा था लेकिन समझा न इशारा, दिल ही तो है बेदाद-गरों की ठोकर से सब ख़्वाब सुहाने चूर हुए अब दिल का सहारा ग़म ही तो है अब ग़म का सहारा दिल ही तो है

Sahir Ludhianvi

4 likes

अपना दिल पेश करूँँ अपनी वफ़ा पेश करूँँ कुछ समझ में नहीं आता तुझे क्या पेश करूँँ तेरे मिलने की ख़ुशी में कोई नग़्मा छेड़ूँ या तिरे दर्द-ए-जुदाई का गिला पेश करूँँ मेरे ख़्वाबों में भी तू मेरे ख़यालों में भी तू कौन सी चीज़ तुझे तुझ से जुदा पेश करूँँ जो तिरे दिल को लुभाए वो अदा मुझ में नहीं क्यूँँ न तुझ को कोई तेरी ही अदा पेश करूँँ

Sahir Ludhianvi

8 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Sahir Ludhianvi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Sahir Ludhianvi's ghazal.