तिरी गाली मुझ दिल को प्यारी लगे दुआ मेरी तुझ मन में भारी लगे तदी क़द्र-ए-आशिक़ की बूझे सजन किसी साथ अगर तुझ कूँ यारी लगे भुला देवे वो ऐश-ओ-आराम सब जिसे ज़ुल्फ़ सीं बे-क़रारी लगे नहीं तुझ सा और शोख़ ऐ मन हिरन तिरी बात दिल को न्यारी लगे भवाँ तेरी शमशीर ज़ुल्फ़ाँ कमंद पलक तेरी जैसे कटारी लगे हुए सर्व बाज़ार दामन का देख अगर गर्द-ए-दामन कनारी लगे न जानूँ तू साक़ी था किस बज़्म का नयन तेरी मुझ कूँ ख़ुमारी लगे वही क़द्र 'फ़ाएज़' की जाने बहुत जिसे इश्क़ का ज़ख़्म कारी लगे
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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मुझ पास कभी वो क़द-ए-शमशाद न आया इस घर मने वो दिल-बर-ए-उस्ताद न आया गुलशन मिरी अँखियाँ में लगे गुलख़न-ए-दोज़ख़ जो सैर को मुझ साथ परी-ज़ाद न आया साँझ आई दियो दिन बी हुआ फ़िक्र में आख़िर वो दिल-बर-ए-जादूगर-ओ-सय्याद न आया आया न हमन पास किया वा'दा-ख़िलाफ़ी 'फ़ाएज़' का कुछ अहवाल मगर याद न आया
Faez Dehlvi
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मिरा महबूब सब का मन हरन है नज़र कर देख वो आहू नैन है नहीं अब जग में वैसा और साजन मुझे सूरत-शनासी बीच फ़न है सबी दीवाने हैं उस मह-लक़ा के मगर वो दिल-रुबा जादू नयन है करे रश्क-ए-गुलिस्ताँ दिल को 'फ़ाएज़' मिरा साजन बहार-ए-अंजुमन है
Faez Dehlvi
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यार मेरा मियान-ए-गुलशन है ग़र्क़-ए-ख़ूँ फूल ता-ब-दामन है दिल लुभाता है सब का वो साजन दिल-फ़रेबी में उस को क्या फ़न है तारे जिऊँ दर है जिस के हल्क़ा-ब-गोश वो बिना गोश सुब्ह-ए-रौशन है उस नज़ारे से सब शहीद हुए वो नयन क्या बला-ए-रह-ज़न है क्या बयाँ कर सकूँ मैं गत उस की 'फ़ाएज़' अत ख़ुश-अदा सिरीजन है
Faez Dehlvi
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गुफ़्तम कि मुख तिरा क्या गुफ़्ता सूरज सूँ बेहतर गुफ़्तम कि कान का दर गुफ़्ता कि बह ज़ अख़्तर गुफ़्तम दहान-ओ-रूयत गुफ़्ता कि ग़ुंचा-ओ-गुल गुफ़्तम कपोल का ख़ाल गुफ़्ता कि क़ुर्स-ए-अम्बर गुफ़्तम कि चश्म-ए-जादू गुफ़्ता कि दोनों ख़ंजर गुफ़्तम धड़ी लबाँ की गुफ़्त अज़ अक़ीक़ बेहतर गुफ़्तम कपोल तेरे गुफ़्ता कि बर्ग-ए-लाला गुफ़्तम कि बोसा तुझ लब गुफ़्ता कि बह ज़ शक्कर गुफ़्तम कि भौंहा तेरी गुफ़्ता हिलाल दोनों गुफ़्तम कि ज़ुल्फ़ तेरी गुफ़्ता कि सुंबुल-ए-तर गुफ़्तम गदा हूँ तेरा गुफ़्ता सही मुनासिब गुफ़्तम असीर तुझ कूँ गुफ़्ता तमाम किश्वर गुफ़्तम कि क़द तुम्हारा गुफ़्ता कि सर्व-ए-तन्नाज़ गुफ़्तम कि दिल तिरा क्या गुफ़्ता कि सख़्त पत्थर गुफ़्तम अदा-ओ-ग़म्ज़ा गुफ़्ता बला-ए-जाँ-हा गुफ़्तम इताब-ओ-क़हरत गुफ़्ता कि हौल-ए-महशर गुफ़्तम कि 'फ़ाएज़' आया गुफ़्ता कि ख़ैर-मक़्दम गुफ़्तम कुजास्त जा-अश गुफ़्ता कि बर-सर-ए-दर
Faez Dehlvi
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एक पल जा न कहूँ नैन सूँ ऐ नूर-ए-बसर टुक न हो इस दिल-ए-तारीक सूँ ऐ बद्र बदर तेरी इस सुब्ह बिना गोश-ओ-ख़त-ए-मुश्कीं सूँ सैर करता हूँ अजब शाम-ओ-सहर शाम-ओ-सहर जल के मैं सुर्मा हुआ बल्कि हुआ काजल भी ख़ाना-ए-चश्म में तुझ पाऊँ जो टुक राह मगर राह-दाराँ लेवें हर गाम में जीव का हासिल हैगा इस राह में ऐ उम्र-ए-अबद जाँ का ख़तर क़िबले सूँ मूँह फिराया तिरे मुख की जानिब किया ज़ाहिद ने मके सूँ सू-ए-बुत-ख़ाना सफ़र चाँद सूरज की रख ऐनक कूँ सदा पीर-ए-फ़लक ख़म हो करता है नज़र ताकि देखे तेरी कमर
Faez Dehlvi
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