एक पल जा न कहूँ नैन सूँ ऐ नूर-ए-बसर टुक न हो इस दिल-ए-तारीक सूँ ऐ बद्र बदर तेरी इस सुब्ह बिना गोश-ओ-ख़त-ए-मुश्कीं सूँ सैर करता हूँ अजब शाम-ओ-सहर शाम-ओ-सहर जल के मैं सुर्मा हुआ बल्कि हुआ काजल भी ख़ाना-ए-चश्म में तुझ पाऊँ जो टुक राह मगर राह-दाराँ लेवें हर गाम में जीव का हासिल हैगा इस राह में ऐ उम्र-ए-अबद जाँ का ख़तर क़िबले सूँ मूँह फिराया तिरे मुख की जानिब किया ज़ाहिद ने मके सूँ सू-ए-बुत-ख़ाना सफ़र चाँद सूरज की रख ऐनक कूँ सदा पीर-ए-फ़लक ख़म हो करता है नज़र ताकि देखे तेरी कमर
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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता तिरे वा'दे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए'तिबार होता तिरी नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अहद बोदा कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तुवार होता कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता रग-ए-संग से टपकता वो लहू कि फिर न थमता जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँँ न ग़र्क़-ए-दरिया न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता उसे कौन देख सकता कि यगाना है वो यकता जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो-चार होता ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान 'ग़ालिब' तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता
Mirza Ghalib
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नया है शहर नए आसरे तलाश करूँँ तू खो गया है कहाँ अब तुझे तलाश करूँँ जो दश्त में भी जलाते थे फ़स्ल-ए-गुल के चराग़ मैं शहर में भी वही आबले तलाश करूँँ तू अक्स है तो कभी मेरी चश्म-ए-तर में उतर तिरे लिए मैं कहाँ आइने तलाश करूँँ तुझे हवा से की आवारगी का इल्म कहाँ कभी मैं तुझ को तिरे सामने तलाश करूँँ ग़ज़ल कहूँ कभी सादास ख़त लिखूँ उस को उदास दिल के लिए मश्ग़ले तलाश करूँँ मिरे वजूद से शायद मिले सुराग़ तिरा कभी मैं ख़ुद को तिरे वास्ते तलाश करूँँ मैं चुप रहूँ कभी बे-वज्ह हँस पड़ूँ 'मोहसिन' उसे गँवा के अजब हौसले तलाश करूँँ
Mohsin Naqvi
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न आते हमें इस में तकरार क्या थी मगर वा'दा करते हुए आर क्या थी तुम्हारे पयामी ने सब राज़ खोला ख़ता इस में बंदे की सरकार क्या थी भरी बज़्म में अपने आशिक़ को ताड़ा तिरी आँख मस्ती में हुश्यार क्या थी तअम्मुल तो था उन को आने में क़ासिद मगर ये बता तर्ज़-ए-इंकार क्या थी खिंचे ख़ुद-ब-ख़ुद जानिब-ए-तूर मूसा कशिश तेरी ऐ शौक़-ए-दीदार क्या थी कहीं ज़िक्र रहता है 'इक़बाल' तेरा फ़ुसूँ था कोई तेरी गुफ़्तार क्या थी
Allama Iqbal
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टूटने पर कोई आए तो फिर ऐसा टूटे कि जिसे देख के हर देखने वाला टूटे अपने बिखरे हुए टुकड़ों को समेटे कब तक एक इंसान की ख़ातिर कोई कितना टूटे कोई टुकड़ा तेरी आँखों में न चुभ जाए कहीं दूर हो जा कि मेरे ख़्वाब का शीशा टूटे मैं किसी और को सोचूँ तो मुझे होश आए मैं किसी और को देखूँ तो ये नश्शा टूटे रंज होता है तो ऐसा कि बताए न बने जब किसी अपने के बाइ'से कोई अपना टूटे पास बैठे हुए यारों को ख़बर तक न हुई हम किसी बात पे इस दर्जा अनोखा टूटे इतनी जल्दी तो सँभलने की तवक़्क़ो' न करो वक़्त ही कितना हुआ है मेरा सपना टूटे दाद की भीक न माँग ऐ मेरे अच्छे शाएर जा तुझे मेरी दुआ है तेरा कासा टूटे तू उसे किस के भरोसे पे नहीं कात रही चर्ख़ को देखने वाली तेरा चर्ख़ा टूटे वर्ना कब तक लिए फिरता रहूँ उस को 'जव्वाद' कोई सूरत हो कि उम्मीद से रिश्ता टूटे
Jawwad Sheikh
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किसी का यूँँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी ये हुस्न ओ इश्क़ तो धोका है सब मगर फिर भी हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है नई नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी कहूँ ये कैसे इधर देख या न देख उधर कि दर्द दर्द है फिर भी नज़र नज़र फिर भी ख़ुशा इशारा-ए-पैहम ज़हे सुकूत-ए-नज़र दराज़ हो के फ़साना है मुख़्तसर फिर भी झपक रही हैं ज़मान ओ मकाँ की भी आँखें मगर है क़ाफ़िला आमादा-ए-सफ़र फिर भी शब-ए-फ़िराक़ से आगे है आज मेरी नज़र कि कट ही जाएगी ये शाम-ए-बे-सहर फिर भी कहीं यही तो नहीं काशिफ़-ए-हयात-ओ-ममात ये हुस्न ओ इश्क़ ब-ज़ाहिर हैं बे-ख़बर फिर भी पलट रहे हैं ग़रीब-उल-वतन पलटना था वो कूचा रू-कश-ए-जन्नत हो घर है घर फिर भी लुटा हुआ चमन-ए-इश्क़ है निगाहों को दिखा गया वही क्या क्या गुल ओ समर फिर भी ख़राब हो के भी सोचा किए तिरे महजूर यही कि तेरी नज़र है तिरी नज़र फिर भी हो बे-नियाज़-ए-असर भी कभी तिरी मिट्टी वो कीमिया ही सही रह गई कसर फिर भी लिपट गया तिरा दीवाना गरचे मंज़िल से उड़ी उड़ी सी है ये ख़ाक-ए-रहगुज़र फिर भी तिरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है उतर गया रग-ए-जाँ में ये नेश्तर फिर भी ग़म-ए-फ़िराक़ के कुश्तों का हश्र क्या होगा ये शाम-ए-हिज्र तो हो जाएगी सहर फिर भी फ़ना भी हो के गिराँ-बारी-ए-हयात न पूछ उठाए उठ नहीं सकता ये दर्द-ए-सर फिर भी सितम के रंग हैं हर इल्तिफ़ात-ए-पिन्हाँ में करम-नुमा हैं तिरे जौर सर-ब-सर फिर भी ख़ता मुआ'फ़ तिरा 'अफ़्व भी है मिस्ल-ए-सज़ा तिरी सज़ा में है इक शान-ए-दर-गुज़र फिर भी अगरचे बे-ख़ुदी-ए-इश्क़ को ज़माना हुआ 'फ़िराक़' करती रही काम वो नज़र फिर भी
Firaq Gorakhpuri
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मुझ पास कभी वो क़द-ए-शमशाद न आया इस घर मने वो दिल-बर-ए-उस्ताद न आया गुलशन मिरी अँखियाँ में लगे गुलख़न-ए-दोज़ख़ जो सैर को मुझ साथ परी-ज़ाद न आया साँझ आई दियो दिन बी हुआ फ़िक्र में आख़िर वो दिल-बर-ए-जादूगर-ओ-सय्याद न आया आया न हमन पास किया वा'दा-ख़िलाफ़ी 'फ़ाएज़' का कुछ अहवाल मगर याद न आया
Faez Dehlvi
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मेरी जाँ वो बादा-ख़्वारी याद है वक़्त-ए-मस्ती गिर्या-ज़ारी याद है मोतिया का हार ओ चम्पा की छड़ी जोड़ा-ए-दामन-किनारी याद है सब अभूकन तेरे तन पर ख़ुशनुमा ख़ूबी-ए-अंगिया ओ सारी याद है अब्र का साया ओ सब्ज़ा राह का जान-ए-मन रथ की सवारी याद है कोयलां के नाले अमराई के बीच उस समय की बे-क़रारी याद है मेंह बी तो टपकता था बूँद बूँद 'फ़ाएज़' उस दिन की सवारी याद है
Faez Dehlvi
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मिरा महबूब सब का मन हरन है नज़र कर देख वो आहू नैन है नहीं अब जग में वैसा और साजन मुझे सूरत-शनासी बीच फ़न है सबी दीवाने हैं उस मह-लक़ा के मगर वो दिल-रुबा जादू नयन है करे रश्क-ए-गुलिस्ताँ दिल को 'फ़ाएज़' मिरा साजन बहार-ए-अंजुमन है
Faez Dehlvi
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यार मेरा मियान-ए-गुलशन है ग़र्क़-ए-ख़ूँ फूल ता-ब-दामन है दिल लुभाता है सब का वो साजन दिल-फ़रेबी में उस को क्या फ़न है तारे जिऊँ दर है जिस के हल्क़ा-ब-गोश वो बिना गोश सुब्ह-ए-रौशन है उस नज़ारे से सब शहीद हुए वो नयन क्या बला-ए-रह-ज़न है क्या बयाँ कर सकूँ मैं गत उस की 'फ़ाएज़' अत ख़ुश-अदा सिरीजन है
Faez Dehlvi
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गुफ़्तम कि मुख तिरा क्या गुफ़्ता सूरज सूँ बेहतर गुफ़्तम कि कान का दर गुफ़्ता कि बह ज़ अख़्तर गुफ़्तम दहान-ओ-रूयत गुफ़्ता कि ग़ुंचा-ओ-गुल गुफ़्तम कपोल का ख़ाल गुफ़्ता कि क़ुर्स-ए-अम्बर गुफ़्तम कि चश्म-ए-जादू गुफ़्ता कि दोनों ख़ंजर गुफ़्तम धड़ी लबाँ की गुफ़्त अज़ अक़ीक़ बेहतर गुफ़्तम कपोल तेरे गुफ़्ता कि बर्ग-ए-लाला गुफ़्तम कि बोसा तुझ लब गुफ़्ता कि बह ज़ शक्कर गुफ़्तम कि भौंहा तेरी गुफ़्ता हिलाल दोनों गुफ़्तम कि ज़ुल्फ़ तेरी गुफ़्ता कि सुंबुल-ए-तर गुफ़्तम गदा हूँ तेरा गुफ़्ता सही मुनासिब गुफ़्तम असीर तुझ कूँ गुफ़्ता तमाम किश्वर गुफ़्तम कि क़द तुम्हारा गुफ़्ता कि सर्व-ए-तन्नाज़ गुफ़्तम कि दिल तिरा क्या गुफ़्ता कि सख़्त पत्थर गुफ़्तम अदा-ओ-ग़म्ज़ा गुफ़्ता बला-ए-जाँ-हा गुफ़्तम इताब-ओ-क़हरत गुफ़्ता कि हौल-ए-महशर गुफ़्तम कि 'फ़ाएज़' आया गुफ़्ता कि ख़ैर-मक़्दम गुफ़्तम कुजास्त जा-अश गुफ़्ता कि बर-सर-ए-दर
Faez Dehlvi
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