ghazalKuch Alfaaz

मिरा महबूब सब का मन हरन है नज़र कर देख वो आहू नैन है नहीं अब जग में वैसा और साजन मुझे सूरत-शनासी बीच फ़न है सबी दीवाने हैं उस मह-लक़ा के मगर वो दिल-रुबा जादू नयन है करे रश्क-ए-गुलिस्ताँ दिल को 'फ़ाएज़' मिरा साजन बहार-ए-अंजुमन है

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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मुझ पास कभी वो क़द-ए-शमशाद न आया इस घर मने वो दिल-बर-ए-उस्ताद न आया गुलशन मिरी अँखियाँ में लगे गुलख़न-ए-दोज़ख़ जो सैर को मुझ साथ परी-ज़ाद न आया साँझ आई दियो दिन बी हुआ फ़िक्र में आख़िर वो दिल-बर-ए-जादूगर-ओ-सय्याद न आया आया न हमन पास किया वा'दा-ख़िलाफ़ी 'फ़ाएज़' का कुछ अहवाल मगर याद न आया

Faez Dehlvi

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यार मेरा मियान-ए-गुलशन है ग़र्क़-ए-ख़ूँ फूल ता-ब-दामन है दिल लुभाता है सब का वो साजन दिल-फ़रेबी में उस को क्या फ़न है तारे जिऊँ दर है जिस के हल्क़ा-ब-गोश वो बिना गोश सुब्ह-ए-रौशन है उस नज़ारे से सब शहीद हुए वो नयन क्या बला-ए-रह-ज़न है क्या बयाँ कर सकूँ मैं गत उस की 'फ़ाएज़' अत ख़ुश-अदा सिरीजन है

Faez Dehlvi

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तिरी गाली मुझ दिल को प्यारी लगे दुआ मेरी तुझ मन में भारी लगे तदी क़द्र-ए-आशिक़ की बूझे सजन किसी साथ अगर तुझ कूँ यारी लगे भुला देवे वो ऐश-ओ-आराम सब जिसे ज़ुल्फ़ सीं बे-क़रारी लगे नहीं तुझ सा और शोख़ ऐ मन हिरन तिरी बात दिल को न्यारी लगे भवाँ तेरी शमशीर ज़ुल्फ़ाँ कमंद पलक तेरी जैसे कटारी लगे हुए सर्व बाज़ार दामन का देख अगर गर्द-ए-दामन कनारी लगे न जानूँ तू साक़ी था किस बज़्म का नयन तेरी मुझ कूँ ख़ुमारी लगे वही क़द्र 'फ़ाएज़' की जाने बहुत जिसे इश्क़ का ज़ख़्म कारी लगे

Faez Dehlvi

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बे-सबब हम से जुदाई न करो मुझ से आशिक़ से बुराई न करो ख़ाकसाराँ को न करिए पामाल जग में फ़िरऔं सी ख़ुदाई न करो बे-गुनाहाँ कूँ न कर डालो क़त्ल आह कूँ तीर-ए-हवाई न करो एक दिल तुम से नहीं है राज़ी जग में हर इक सूँ बुराई न करो महव है 'फ़ाएज़'-ए-शैदा तुम पर उस से हर लहजा बखाई न करो

Faez Dehlvi

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गुफ़्तम कि मुख तिरा क्या गुफ़्ता सूरज सूँ बेहतर गुफ़्तम कि कान का दर गुफ़्ता कि बह ज़ अख़्तर गुफ़्तम दहान-ओ-रूयत गुफ़्ता कि ग़ुंचा-ओ-गुल गुफ़्तम कपोल का ख़ाल गुफ़्ता कि क़ुर्स-ए-अम्बर गुफ़्तम कि चश्म-ए-जादू गुफ़्ता कि दोनों ख़ंजर गुफ़्तम धड़ी लबाँ की गुफ़्त अज़ अक़ीक़ बेहतर गुफ़्तम कपोल तेरे गुफ़्ता कि बर्ग-ए-लाला गुफ़्तम कि बोसा तुझ लब गुफ़्ता कि बह ज़ शक्कर गुफ़्तम कि भौंहा तेरी गुफ़्ता हिलाल दोनों गुफ़्तम कि ज़ुल्फ़ तेरी गुफ़्ता कि सुंबुल-ए-तर गुफ़्तम गदा हूँ तेरा गुफ़्ता सही मुनासिब गुफ़्तम असीर तुझ कूँ गुफ़्ता तमाम किश्वर गुफ़्तम कि क़द तुम्हारा गुफ़्ता कि सर्व-ए-तन्नाज़ गुफ़्तम कि दिल तिरा क्या गुफ़्ता कि सख़्त पत्थर गुफ़्तम अदा-ओ-ग़म्ज़ा गुफ़्ता बला-ए-जाँ-हा गुफ़्तम इताब-ओ-क़हरत गुफ़्ता कि हौल-ए-महशर गुफ़्तम कि 'फ़ाएज़' आया गुफ़्ता कि ख़ैर-मक़्दम गुफ़्तम कुजास्त जा-अश गुफ़्ता कि बर-सर-ए-दर

Faez Dehlvi

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