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teri ankhen na rahin aina-khana mire dost kitni tezi se badalta hai zamana mire dost jaane kis kaam men masruf raha barson tak yaad aaya hi nahin tujh ko bhulana mire dost puchhna mat ki ye kya haal bana rakkha hai aina ban ke mira dil na dukhana mire dost is mulaqat men jo ghhair-zaruri ho jaae yaad rahta hai kise haath milana mire dost dekhna mujh ko magar meri pazirai ko apni ankhon men sitare na sajana mire dost ab vo titli hai na vo umr taaqub vaali main na kahta tha bahut duur na jaana mare dost hijr taqdir men likkha tha ki majburi thi chhod is baat se kya milna milana mire dost tu ne ehsan kiya apna bana kar mujh ko varna main kya tha haqiqat na fasana mire dost is kahani men kise kaun kahan chhod gaya yaad aa jaae to mujh ko bhi batana mire dost chhod aaya huun havaon ki nigahbani men vo samundar vo jazira vo khazana mire dost aise raston pe jo aapas men kahin milte hon kyuun na us mod se ho jaaen ravana mire dost teri aankhen na rahin aaina-khana mere dost kitni tezi se badalta hai zamana mere dost jaane kis kaam mein masruf raha barson tak yaad aaya hi nahin tujh ko bhulana mere dost puchhna mat ki ye kya haal bana rakkha hai aaina ban ke mera dil na dukhana mere dost is mulaqat mein jo ghair-zaruri ho jae yaad rahta hai kise hath milana mere dost dekhna mujh ko magar meri pazirai ko apni aankhon mein sitare na sajaana mere dost ab wo titli hai na wo umr taaqub wali main na kahta tha bahut dur na jaana mare dost hijr taqdir mein likkha tha ki majburi thi chhod is baat se kya milna milana mere dost tu ne ehsan kiya apna bana kar mujh ko warna main kya tha haqiqat na fasana mere dost is kahani mein kise kaun kahan chhod gaya yaad aa jae to mujh ko bhi batana mere dost chhod aaya hun hawaon ki nigahbani mein wo samundar wo jazira wo khazana mere dost aise raston pe jo aapas mein kahin milte hon kyun na us mod se ho jaen rawana mere dost

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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वो एक पक्षी जो गुंजन कर रहा है वो मुझ में प्रेम सृजन कर रहा है बहुत दिन हो गए है तुम सेे बिछड़े तुम्हें मिलने को अब मन कर रहा है नदी के शांत तट पर बैठ कर मन तेरी यादें विसर्जन कर रहा है

Azhar Iqbal

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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है

Ali Zaryoun

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मुझ को ये फ़िक्र कब है कि साया कहाँ गया सूरज को रो रहा हूँ ख़ुदाया कहाँ गया फिर आइने में ख़ून दिखाई दिया मुझे आँखों में आ गया तो छुपाया कहाँ गया आवाज़ दे रहा था कोई मुझ को ख़्वाब में लेकिन ख़बर नहीं कि बुलाया कहाँ गया कितने चराग़ घर में जलाए गए न पूछ घर आप जल गया है जलाया कहाँ गया ये भी ख़बर नहीं है कि हमराह कौन है पूछा कहाँ गया है बताया कहाँ गया वो भी बदल गया है मुझे छोड़ने के बा'द मुझ से भी अपने आप में आया कहाँ गया तुझ को गँवा दिया है मगर अपने आप को बर्बाद कर दिया है गँवाया कहाँ गया

Faisal Ajmi

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हर्फ़ अपने ही मआ'नी की तरह होता है प्यास का ज़ाइक़ा पानी की तरह होता है मैं भी रुकता हूँ मगर रेग-ए-रवाँ की सूरत मेरा ठहराव रवानी की तरह होता है तेरे जाते ही मैं शिकनों से न भर जाऊँ कहीं क्यूँँ जुदा मुझ से जवानी की तरह होता है जिस्म थकता नहीं चलने से कि वहशत का सफ़र ख़्वाब में नक़्ल-ए-मकानी की तरह होता है चाँद ढलता है तो उस का भी मुझे दुख 'फ़ैसल' किसी गुम-गश्ता निशानी की तरह होता है

Faisal Ajmi

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ये भी नहीं कि दस्त-ए-दुआ तक नहीं गया मेरा सवाल ख़ल्क़-ए-ख़ुदा तक नहीं गया फिर यूँँ हुआ कि हाथ से कश्कोल गिर पड़ा ख़ैरात ले के मुझ से चला तक नहीं गया मस्लूब हो रहा था मगर हँस रहा था मैं आँखों में अश्क ले के ख़ुदा तक नहीं गया जो बर्फ़ गिर रही थी मिरे सर के आस-पास क्या लिख रही थी मुझ से पढ़ा तक नहीं गया 'फ़ैसल' मुकालिमा था हवाओं का फूल से वो शोर था कि मुझ से सुना तक नहीं गया

Faisal Ajmi

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तेरी आँखें न रहीं आईना-ख़ाना मिरे दोस्त कितनी तेज़ी से बदलता है ज़माना मिरे दोस्त जाने किस काम में मसरूफ़ रहा बरसों तक याद आया ही नहीं तुझ को भुलाना मिरे दोस्त पूछना मत कि ये क्या हाल बना रक्खा है आईना बन के मिरा दिल न दुखाना मिरे दोस्त इस मुलाक़ात में जो ग़ैर-ज़रूरी हो जाए याद रहता है किसे हाथ मिलाना मिरे दोस्त देखना मुझ को मगर मेरी पज़ीराई को अपनी आँखों में सितारे न सजाना मिरे दोस्त अब वो तितली है न वो उम्र तआ'क़ुब वाली मैं न कहता था बहुत दूर न जाना मरे दोस्त हिज्र तक़दीर में लिक्खा था कि मजबूरी थी छोड़ इस बात से क्या मिलना मिलाना मिरे दोस्त तू ने एहसान किया अपना बना कर मुझ को वर्ना मैं क्या था हक़ीक़त न फ़साना मिरे दोस्त इस कहानी में किसे कौन कहाँ छोड़ गया याद आ जाए तो मुझ को भी बताना मिरे दोस्त छोड़ आया हूँ हवाओं की निगहबानी में वो समुंदर वो जज़ीरा वो ख़ज़ाना मिरे दोस्त ऐसे रस्तों पे जो आपस में कहीं मिलते हों क्यूँँ न उस मोड़ से हो जाएँ रवाना मिरे दोस्त

Faisal Ajmi

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