ghazalKuch Alfaaz

teri surat ko dekhta huun main us ki qudrat ko dekhta huun main jab hui subh aa gae naseh unhin hazrat ko dekhta huun main vo musibat suni nahin jaati jis musibat ko dekhta huun main dekhne aae hain jo meri nabz un ki surat ko dekhta huun main maut mujh ko dikhai deti hai jab tabiat ko dekhta huun main shab-e-furqat utha utha kar sar subh-e-ishrat ko dekhta huun main duur baitha hua sar-e-mahfil rang-e-sohbat ko dekhta huun main har musibat hai be-maza shab-e-ghham aafat aafat ko dekhta huun main na mohabbat ko jante ho tum na muravvat ko dekhta huun main koi dushman ko yuun na dekhega jaise qismat ko dekhta huun main hashr men 'daghh' koi dost nahin saari khilqat ko dekhta huun main teri surat ko dekhta hun main us ki qudrat ko dekhta hun main jab hui subh aa gae naseh unhin hazrat ko dekhta hun main wo musibat suni nahin jati jis musibat ko dekhta hun main dekhne aae hain jo meri nabz un ki surat ko dekhta hun main maut mujh ko dikhai deti hai jab tabiat ko dekhta hun main shab-e-furqat utha utha kar sar subh-e-ishrat ko dekhta hun main dur baitha hua sar-e-mahfil rang-e-sohbat ko dekhta hun main har musibat hai be-maza shab-e-gham aafat aafat ko dekhta hun main na mohabbat ko jaante ho tum na murawwat ko dekhta hun main koi dushman ko yun na dekhega jaise qismat ko dekhta hun main hashr mein 'dagh' koi dost nahin sari khilqat ko dekhta hun main

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं सुनसान घर ये क्यूँँ न हो मेहमान तो गया क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया बज़्म-ए-अदू में सूरत-ए-परवाना दिल मिरा गो रश्क से जला तिरे क़ुर्बान तो गया होश ओ हवा से ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया

Dagh Dehlvi

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साज़ ये कीना-साज़ क्या जानें नाज़ वाले नियाज़ क्या जानें शम्अ'''-रू आप गो हुए लेकिन लुत्फ़-ए-सोज़-ओ-गुदाज़ क्या जानें कब किसी दर की जब्हा-साई की शैख़ साहब नमाज़ क्या जानें जो रह-ए-इश्क़ में क़दम रक्खें वो नशेब-ओ-फ़राज़ क्या जानें पूछिए मय-कशों से लुत्फ़-ए-शराब ये मज़ा पाक-बाज़ क्या जानें बले चितवन तिरी ग़ज़ब री निगाह क्या करेंगे ये नाज़ क्या जानें जिन को अपनी ख़बर नहीं अब तक वो मिरे दिल का राज़ क्या जानें हज़रत-ए-ख़िज़्र जब शहीद न हों लुत्फ़-ए-उम्र-ए-दराज़ क्या जानें जो गुज़रते हैं 'दाग़' पर सद में आप बंदा-नवाज़ क्या जानें

Dagh Dehlvi

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भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं किसी से आज बिगड़ी है कि वो यूँँ बन के बैठे हैं दिलों पर सैकड़ों सिक्के तिरे जोबन के बैठे हैं कलेजों पर हज़ारों तीर इस चितवन के बैठे हैं इलाही क्यूँँ नहीं उठती क़यामत माजरा क्या है हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं ये गुस्ताख़ी ये छेड़ अच्छी नहीं है ऐ दिल-ए-नादाँ अभी फिर रूठ जाएँगे अभी तो मन के बैठे हैं असर है जज़्ब-ए-उल्फ़त में तो खिंच कर आ ही जाएँगे हमें पर्वा नहीं हम से अगर वो तन के बैठे हैं सुबुक हो जाएँगे गर जाएँगे वो बज़्म-ए-दुश्मन में कि जब तक घर में बैठे हैं वो लाखों मन के बैठे हैं फ़ुसूँ है या दुआ है या मुअ'म्मा खुल नहीं सकता वो कुछ पढ़ते हुए आगे मिरे मदफ़न के बैठे हैं बहुत रोया हूँ मैं जब से ये मैं ने ख़्वाब देखा है कि आप आँसू बहाते सामने दुश्मन के बैठे हैं खड़े हों ज़ेर-ए-तूबा वो न दम लेने को दम भर भी जो हसरत-मंद तेरे साया-ए-दामन के बैठे हैं तलाश-ए-मंज़िल-ए-मक़्सद की गर्दिश उठ नहीं सकती कमर खोले हुए रस्ते में हम रहज़न के बैठे हैं ये जोश-ए-गिर्या तो देखो कि जब फ़ुर्क़त में रोया हूँ दर ओ दीवार इक पल में मिरे मदफ़न के बैठे हैं निगाह-ए-शोख़ ओ चश्म-ए-शौक़ में दर-पर्दा छनती है कि वो चिलमन में हैं नज़दीक हम चिलमन के बैठे हैं ये उठना बैठना महफ़िल में उन का रंग लाएगा क़यामत बन के उट्ठेंगे भबूका बन के बैठे हैं किसी की शामत आएगी किसी की जान जाएगी किसी की ताक में वो बाम पर बन-ठन के बैठे हैं क़सम दे कर उन्हें ये पूछ लो तुम रंग-ढंग उस के तुम्हारी बज़्म में कुछ दोस्त भी दुश्मन के बैठे हैं कोई छींटा पड़े तो 'दाग़' कलकत्ते चले जाएँ अज़ीमाबाद में हम मुंतज़िर सावन के बैठे हैं

Dagh Dehlvi

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जो हो सकता है उस से वो किसी से हो नहीं सकता मगर देखो तो फिर कुछ आदमी से हो नहीं सकता मोहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता मिरा मरना भी तो मेरी ख़ुशी से हो नहीं सकता अलग करना रक़ीबों का इलाही तुझ को आसाँ है मुझे मुश्किल कि मेरी बेकसी से हो नहीं सकता किया है वादा-ए-फ़र्दा उन्हों ने देखिए क्या हो यहाँ सब्र ओ तहम्मुल आज ही से हो नहीं सकता ये मुश्ताक़-ए-शहादत किस जगह जाएँ किसे ढूँडें कि तेरा काम क़ातिल जब तुझी से हो नहीं सकता लगा कर तेग़ क़िस्सा पाक कीजिए दाद-ख़्वाहों का किसी का फ़ैसला कर मुंसिफ़ी से हो नहीं सकता मिरा दुश्मन ब-ज़ाहिर चार दिन को दोस्त है तेरा किसी का हो रहे ये हर किसी से हो नहीं सकता पुर्सिश कहोगे क्या वहाँ जब याँ ये सूरत है अदा इक हर्फ़-ए-वादा नाज़ुकी से हो नहीं सकता न कहिए गो कि हाल-ए-दिल मगर रंग-आश्ना हैं हम ये ज़ाहिर आप की क्या ख़ामुशी से हो नहीं सकता किया जो हम ने ज़ालिम क्या करेगा ग़ैर मुँह क्या है करे तो सब्र ऐसा आदमी से हो नहीं सकता चमन में नाज़ बुलबुल ने किया जो अपनी नाले पर चटक कर ग़ुंचा बोला क्या किसी से हो नहीं सकता नहीं गर तुझ पे क़ाबू दिल है पर कुछ ज़ोर हो अपना करूँँ क्या ये भी तो ना-ताक़ती से हो नहीं सकता न रोना है तरीक़े का न हँसना है सलीक़े का परेशानी में कोई काम जी से हो नहीं सकता हुआ हूँ इस क़दर महजूब अर्ज़-ए-मुद्दआ कर के कि अब तो उज़्र भी शर्मिंदगी से हो नहीं सकता ग़ज़ब में जान है क्या कीजे बदला रंज-ए-फ़ुर्क़त का बदी से कर नहीं सकते ख़ुशी से हो नहीं सकता मज़ा जो इज़्तिराब-ए-शौक़ से आशिक़ को है हासिल वो तस्लीम ओ रज़ा ओ बंदगी से हो नहीं सकता ख़ुदा जब दोस्त है ऐ 'दाग़' क्या दुश्मन से अंदेशा हमारा कुछ किसी की दुश्मनी से हो नहीं सकता

Dagh Dehlvi

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सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-उल्फ़त कभी न करना तुम्हें क़सम है हमारे सर की हमारे हक़ में कमी न करना हमारी मय्यत पे तुम जो आना तो चार आँसू बहा के जाना ज़रा रहे पास-ए-आबरू भी कहीं हमारी हँसी न करना कहाँ का आना कहाँ का जाना वो जानते ही नहीं ये रस्में वहाँ है वअ'दे की भी ये सूरत कभी तो करना कभी न करना लिए तो चलते हैं हज़रत-ए-दिल तुम्हें भी उस अंजुमन में लेकिन हमारे पहलू में बैठ कर तुम हमीं से पहलू-तही न करना नहीं है कुछ क़त्ल उन का आसाँ ये सख़्त-जाँ हैं बुरे बला के क़ज़ा को पहले शरीक करना ये काम अपनी ख़ुशी न करना हलाक अंदाज़-ए-वस्ल करना कि पर्दा रह जाए कुछ हमारा ग़म-ए-जुदाई में ख़ाक कर के कहीं अदू की ख़ुशी न करना मिरी तो है बात ज़हर उन को वो उन के मतलब ही की न क्यूँँ हो कि उन से जो इल्तिजा से कहना ग़ज़ब है उन को वही न करना हुआ अगर शौक़ आइने से तो रुख़ रहे रास्ती की जानिब मिसाल-ए-आरिज़ सफ़ाई रखना ब-रंग-ए-काकुल कजी न करना वो ही हमारा तरीक़-ए-उल्फ़त कि दुश्मनों से भी मिल के चलना ये एक शेवा तिरा सितमगर कि दोस्त से दोस्ती न करना हम एक रस्ता गली का उस की दिखा के दिल को हुए पशेमाँ ये हज़रत-ए-ख़िज़्र को जता दो किसी की तुम रहबरी न करना बयान-ए-दर्द-ए-फ़िराक़ कैसा कि है वहाँ अपनी ये हक़ीक़त जो बात करनी तो नाला करना नहीं तो वो भी कभी न करना मदार है नासेहो तुम्हीं पर तमाम अब उस की मुंसिफ़ी का ज़रा तो कहना ख़ुदा-लगी भी फ़क़त सुख़न-परवरी न करना बुरी है ऐ 'दाग़' राह-ए-उल्फ़त ख़ुदा न ले जाए ऐसे रस्ते जो अपनी तुम ख़ैर चाहते हो तो भूल कर दिल-लगी न करना

Dagh Dehlvi

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