ghazalKuch Alfaaz

tire ishq ki intiha chahta huun miri sadgi dekh kya chahta huun sitam ho ki ho vada-e-be-hijabi koi baat sabr-azma chahta huun ye jannat mubarak rahe zahidon ko ki main aap ka samna chahta huun zara sa to dil huun magar shokh itna vahi lan-tarani suna chahta huun koi dam ka mehman huun ai ahl-e-mahfil charaghh-e-sahar huun bujha chahta huun bhari bazm men raaz ki baat kah di bada be-adab huun saza chahta huun tere ishq ki intiha chahta hun meri sadgi dekh kya chahta hun sitam ho ki ho wada-e-be-hijabi koi baat sabr-azma chahta hun ye jannat mubarak rahe zahidon ko ki main aap ka samna chahta hun zara sa to dil hun magar shokh itna wahi lan-tarani suna chahta hun koi dam ka mehman hun ai ahl-e-mahfil charagh-e-sahar hun bujha chahta hun bhari bazm mein raaz ki baat kah di bada be-adab hun saza chahta hun

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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मैं भी तुम जैसा हूँ अपने से जुदा मत समझो आदमी ही मुझे रहने दो ख़ुदा मत समझो ये जो मैं होश में रहता नहीं तुम सेे मिल कर ये मिरा इश्क़ है तुम इस को नशा मत समझो रास आता नहीं सब को ये मोहब्बत का मरज़ मेरी बीमारी को तुम अपनी दवा मत समझो

Shakeel Azmi

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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी

Ali Zaryoun

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न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए जहाँ है तेरे लिए तू नहीं जहाँ के लिए ये अक़्ल ओ दिल हैं शरर शोला-ए-मोहब्बत के वो ख़ार-ओ-ख़स के लिए है ये नीस्ताँ के लिए मक़ाम-ए-परवरिश-ए-आह-ओ-लाला है ये चमन न सैर-ए-गुल के लिए है न आशियाँ के लिए रहेगा रावी ओ नील ओ फ़ुरात में कब तक तिरा सफ़ीना कि है बहर-ए-बे-कराँ के लिए निशान-ए-राह दिखाते थे जो सितारों को तरस गए हैं किसी मर्द-ए-राह-दाँ के लिए निगह बुलंद सुख़न दिल-नवाज़ जाँ पुर-सोज़ यही है रख़्त-ए-सफ़र मीर-ए-कारवाँ के लिए ज़रा सी बात थी अंदेशा-ए-अजम ने उसे बढ़ा दिया है फ़क़त ज़ेब-ए-दास्ताँ के लिए मिरे गुलू में है इक नग़्मा जिब्राईल-आशोब सँभाल कर जिसे रक्खा है ला-मकाँ के लिए

Allama Iqbal

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अफ़्लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर करते हैं ख़िताब आख़िर उठते हैं हिजाब आख़िर अहवाल-ए-मोहब्बत में कुछ फ़र्क़ नहीं ऐसा सोज़ ओ तब-ओ-ताब अव्वल सोज़ ओ तब-ओ-ताब आख़िर मैं तुझ को बताता हूँ तक़दीर-ए-उमम क्या है शमशीर-ओ-सिनाँ अव्वल ताऊस-ओ-रुबाब आख़िर मय-ख़ाना-ए-यूरोप के दस्तूर निराले हैं लाते हैं सुरूर अव्वल देते हैं शराब आख़िर क्या दबदबा-ए-नादिर क्या शौकत-ए-तैमूरी हो जाते हैं सब दफ़्तर ग़र्क़-ए-मय-ए-नाब आख़िर ख़ल्वत की घड़ी गुज़री जल्वत की घड़ी आई छुटने को है बिजली से आग़ोश-ए-सहाब आख़िर था ज़ब्त बहुत मुश्किल इस सैल-ए-मआ'नी का कह डाले क़लंदर ने असरार-ए-किताब आख़िर

Allama Iqbal

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नाला है बुलबुल-ए-शोरीदा तिरा ख़ाम अभी अपने सीने में इसे और ज़रा थाम अभी पुख़्ता होती है अगर मस्लहत-अंदेश हो अक़्ल इश्क़ हो मस्लहत-अंदेश तो है ख़ाम अभी बे-ख़तर कूद पड़ा आतिश-ए-नमरूद में इश्क़ अक़्ल है महव-ए-तमाशा-ए-लब-ए-बाम अभी इश्क़ फ़र्मूदा-ए-क़ासिद से सुबुक-गाम-ए-अमल अक़्ल समझी ही नहीं म'अनी-ए-पैग़ाम अभी शेवा-ए-इश्क़ है आज़ादी ओ दहर-आशेबी तू है ज़ुन्नारी-ए-बुत-ख़ाना-ए-अय्याम अभी उज़्र-ए-परहेज़ पे कहता है बिगड़ कर साक़ी है तिरे दिल में वही काविश-ए-अंजाम अभी सई-ए-पैहम है तराज़ू-कम-ओ-कैफ़-ए-हयात तेरी मीज़ाँ है शुमार-ए-सहर-ओ-शाम अभी अब्र-ए-नैसाँ ये तुनुक-बख़्शी-ए-शबनम कब तक मेरे कोहसार के लाले हैं तही-जाम अभी बादा-गर्दान-ए-अजम वो अरबी मेरी शराब मिरे साग़र से झिजकते हैं मय-आशाम अभी ख़बर 'इक़बाल' की लाई है गुलिस्ताँ से नसीम नौ-गिरफ़्तार फड़कता है तह-ए-दाम अभी

Allama Iqbal

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अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं आब ओ गिल के खेल को अपना जहाँ समझा था मैं बे-हिजाबी से तिरी टूटा निगाहों का तिलिस्म इक रिदा-ए-नील-गूँ को आसमाँ समझा था मैं कारवाँ थक कर फ़ज़ा के पेच-ओ-ख़म में रह गया मेहर ओ माह ओ मुश्तरी को हम-इनाँ समझा था मैं इश्क़ की इक जस्त ने तय कर दिया क़िस्सा तमाम इस ज़मीन ओ आसमाँ को बे-कराँ समझा था मैं कह गईं राज़-ए-मोहब्बत पर्दा-दारी-हा-ए-शौक़ थी फ़ुग़ाँ वो भी जिसे ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ समझा था मैं थी किसी दरमाँदा रह-रौ की सदा-ए-दर्दनाक जिस को आवाज़-ए-रहील-ए-कारवाँ समझा था मैं

Allama Iqbal

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मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ूमंदी मक़ाम-ए-बंदगी दे कर न लूँ शान-ए-ख़ुदावंदी तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी हिजाब इक्सीर है आवारा-ए-कू-ए-मोहब्बत को मिरी आतिश को भड़काती है तेरी देर-पैवंदी गुज़र-औक़ात कर लेता है ये कोह ओ बयाबाँ में कि शाहीं के लिए ज़िल्लत है कार-ए-आशियाँ-बंदी ये फ़ैज़ान-ए-नज़र था या कि मकतब की करामत थी सिखाए किस ने इस्माईल को आदाब-ए-फ़रज़ंदी ज़ियारत-गाह-ए-अहल-ए-अज़्म-ओ-हिम्मत है लहद मेरी कि ख़ाक-ए-राह को मैं ने बताया राज़-ए-अलवंदी मिरी मश्शातगी की क्या ज़रूरत हुस्न-ए-मअ'नी को कि फ़ितरत ख़ुद-ब-ख़ुद करती है लाले की हिना-बंदी

Allama Iqbal

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