ghazalKuch Alfaaz

तू समझता है कि रिश्तों की दुहाई देंगे हम तो वो हैं तिरे चेहरे से दिखाई देंगे हम को महसूस किया जाए है ख़ुश्बू की तरह हम कोई शोर नहीं हैं जो सुनाई देंगे फ़ैसला लिक्खा हुआ रक्खा है पहले से ख़िलाफ़ आप क्या साहब अदालत में सफ़ाई देंगे पिछली सफ़ में ही सही है तो इसी महफ़िल में आप देखेंगे तो हम क्यूँँ न दिखाई देंगे

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो

Jawwad Sheikh

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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अपने साए को इतना समझाने दे मुझ तक मेरे हिस्से की धूप आने दे एक नज़र में कई ज़माने देखे तो बूढ़ी आँखों की तस्वीर बनाने दे बाबा दुनिया जीत के मैं दिखला दूँगा अपनी नज़र से दूर तो मुझ को जाने दे मैं भी तो इस बाग़ का एक परिंदा हूँ मेरी ही आवाज़ में मुझ को गाने दे फिर तो ये ऊँचा ही होता जाएगा बचपन के हाथों में चाँद आ जाने दे फ़स्लें पक जाएँ तो खेत से बिछ्ड़ेंगी रोती आँख को प्यार कहाँ समझाने दे

Waseem Barelvi

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वो मुझ को क्या बताना चाहता है जो दुनिया से छुपाना चाहता है मुझे देखो कि मैं उस को ही चाहूँ जिसे सारा ज़माना चाहता है क़लम करना कहाँ है उस का मंशा वो मेरा सर झुकाना चाहता है शिकायत का धुआँ आँखों से दिल तक तअ'ल्लुक़ टूट जाना चाहता है तक़ाज़ा वक़्त का कुछ भी हो ये दिल वही क़िस्सा पुराना चाहता है

Waseem Barelvi

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अँधेरा ज़ेहन का सम्त-ए-सफ़र जब खोने लगता है किसी का ध्यान आता है उजाला होने लगता है वो जितनी दूर हो उतना ही मेरा होने लगता है मगर जब पास आता है तो मुझ से खोने लगता है किसी ने रख दिए ममता-भरे दो हाथ क्या सर पर मिरे अंदर कोई बच्चा बिलक कर रोने लगता है मोहब्बत चार दिन की और उदासी ज़िंदगी भर की यही सब देखता है और 'कबीरा' रोने लगता है समझते ही नहीं नादान कै दिन की है मिल्किय्यत पराए खेतों पे अपनों में झगड़ा होने लगता है ये दिल बच कर ज़माने भर से चलना चाहे है लेकिन जब अपनी राह चलता है अकेला होने लगता है

Waseem Barelvi

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रंग बे-रंग हों ख़ुशबू का भरोसा जाए मेरी आँखों से जो दुनिया तुझे देखा जाए हम ने जिस राह को छोड़ा फिर उसे छोड़ दिया अब न जाएँगे उधर चाहे ज़माना जाए मैं ने मुद्दत से कोई ख़्वाब नहीं देखा है हाथ रख दे मिरी आँखों पे कि नींद आ जाए मैं गुनाहों का तरफ़-दार नहीं हूँ फिर भी रात को दिन की निगाहों से न देखा जाए कुछ बड़ी सोचों में ये सोचें भी शामिल हैं 'वसीम' किस बहाने से कोई शहर जलाया जाए

Waseem Barelvi

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कहाँ सवाब कहाँ क्या अज़ाब होता है मोहब्बतों में कब इतना हिसाब होता है बिछड़ के मुझ से तुम अपनी कशिश न खो देना उदास रहने से चेहरा ख़राब होता है उसे पता ही नहीं है कि प्यार की बाज़ी जो हार जाए वही कामयाब होता है जब उस के पास गँवाने को कुछ नहीं होता तो कोई आज का इज़्ज़त-मआब होता है जिसे मैं लिखता हूँ ऐसे कि ख़ुद ही पढ़ पाँव किताब-ए-ज़ीस्त में ऐसा भी बाब होता है बहुत भरोसा न कर लेना अपनी आँखों पर दिखाई देता है जो कुछ वो ख़्वाब होता है

Waseem Barelvi

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