tu qarib aae to qurbat ka yuun izhar karun aaina samne rakh kar tira didar karun samne tere karun haar ka apni elaan aur akele men tiri jiit se inkar karun pahle sochun use phir us ki banaun tasvir aur phir us men hi paida dar-o-divar karun mire qabze men na mitti hai na badal na hava phir bhi chahat hai ki har shakh samar-bar karun subh hote hi ubhar aati hai salim ho kar vahi divar jise roz main mismar karun tu qarib aae to qurbat ka yun izhaar karun aaina samne rakh kar tera didar karun samne tere karun haar ka apni elan aur akele mein teri jit se inkar karun pahle sochun use phir us ki banaun taswir aur phir us mein hi paida dar-o-diwar karun mere qabze mein na mitti hai na baadal na hawa phir bhi chahat hai ki har shakh samar-bar karun subh hote hi ubhar aati hai salim ho kar wahi diwar jise roz main mismar karun
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शोर करूँँगा और न कुछ भी बोलूँगा ख़ामोशी से अपना रोना रो लूँगा सारी उम्र इसी ख़्वाहिश में गुज़री है दस्तक होगी और दरवाज़ा खोलूँगा तन्हाई में ख़ुद से बातें करनी हैं मेरे मुँह में जो आएगा बोलूँगा रात बहुत है तुम चाहो तो सो जाओ मेरा क्या है मैं दिन में भी सो लूँगा तुम को दिल की बात बतानी है लेकिन आँखें बंद करो तो मुट्ठी खोलूँगा
Tehzeeb Hafi
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प्यार में जिस्म को यकसर न मिटा जाने दे क़ुर्बत-ए-लम्स को गाली न बना जाने दे तू जो हर रोज़ नए हुस्न पे मर जाता है तू बताएगा मुझे इश्क़ है क्या जाने दे चाय पीते हैं कहीं बैठ के दोनों भाई जा चुकी है ना तो बस छोड़ चल आ जाने दे
Ali Zaryoun
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मुझे मिलने महीनों बा'द आई हो, बधाई हो! मचाया शोर यारों ने "बधाई हो, बधाई हो!" इधर मैं भी बिखेरे जा रहा हूँ हर तरफ़ जलवा उधर तुम भी हर इक महफ़िल में छाई हो, बधाई हो! अगर बाली के जैसा वो निकल जाए तो लानत है मगर लक्ष्मण के जैसा जिस का भाई हो, बधाई हो! वो जिस के पास दौलत और शोहरत हो बधाई क्या वो जिस के हाथ में तेरी कलाई हो, बधाई हो!
Rituraj kumar
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जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना बहुत हैं फ़ाएदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती ये वो शाख़ें हैं जिन को अब शजर अच्छा नहीं लगता ये क्यूँँ बाक़ी रहे आतिश-ज़नो ये भी जला डालो कि सब बे-घर हों और मेरा हो घर अच्छा नहीं लगता
Javed Akhtar
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो कब तक किसी से कोई मोहब्बत से पेश आएँ उस को मेरे रवय्ये पर दुख है तो यार हो
Tehzeeb Hafi
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More from Nida Fazli
जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे उसे उम्र सारी हमारी लगे उजाला सा है उस के चारों तरफ़ वो नाज़ुक बदन पाँव भारी लगे वो ससुराल से आई है माइके उसे जितना देखो वो प्यारी लगे हसीन सूरतें और भी हैं मगर वो सब सैकड़ों में हज़ारी लगे चलो इस तरह से सजाएँ उसे ये दुनिया हमारी तुम्हारी लगे उसे देखना शेर-गोई का फ़न उसे सोचना दीन-दारी लगे
Nida Fazli
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आनी जानी हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही जब तलक है ख़ूब-सूरत है चलो यूँ ही सही हम कहाँ के देवता हैं बे-वफ़ा वो हैं तो क्या घर में कोई घर की ज़ीनत है चलो यूँ ही सही वो नहीं तो कोई तो होगा कहीं उस की तरह जिस्म में जब तक हरारत है चलो यूँ ही सही मैले हो जाते हैं रिश्ते भी लिबासों की तरह दोस्ती हर दिन की मेहनत है चलो यूँ ही सही भूल थी अपनी फ़रिश्ता आदमी में ढूँढ़ना आदमी में आदमिय्यत है चलो यूँ ही सही जैसी होनी चाहिए थी वैसी तो दुनिया नहीं दुनिया-दारी भी ज़रूरत है चलो यूँ ही सही
Nida Fazli
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दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी रात जंगल में कोई शम्अ' जलाने से रही फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की जगह अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही
Nida Fazli
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गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया जब तक था आसमान में सूरज सभी का था फिर यूँँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ आलम तमाम चंद मचानों में बट गया ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया
Nida Fazli
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राक्षस था न ख़ुदा था पहले आदमी कितना बड़ा था पहले आसमाँ खेत समुंदर सब लाल ख़ून काग़ज़ पे उगा था पहले मैं वो मक़्तूल जो क़ातिल न बना हाथ मेरा भी उठा था पहले अब किसी से भी शिकायत न रही जाने किस किस से गिला था पहले शहर तो बा'द में वीरान हुआ मेरा घर ख़ाक हुआ था पहले
Nida Fazli
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