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udhad jaae jo ik bakhiya to haiat hi badal jaae libas-e-rishta-ha-e-khun ki vaq'at hi badal jaae musavvar hai vo aisa jis ki har takhliq hai shahkar zara sa 'uzv yaan se vaan ho murat hi badal jaae uthae rukh se anchal to siyahi shab ki chhat jaae hatae zulf to mah ki bhi qismat hi badal jaae khulen gar qissa-ha-e-khalvat-e-murshid muridon par nigahon se vo gir jaaen 'aqidat hi badal jaae 'ajab hai kaifiyat apni 'mudassir' muztarib hai dil mile koi to phir andar ki halat hi badal jaae udhad jae jo ek bakhiya to haiat hi badal jae libas-e-rishta-ha-e-khun ki waq'at hi badal jae musawwar hai wo aisa jis ki har takhliq hai shahkar zara sa 'uzw yan se wan ho murat hi badal jae uthae rukh se aanchal to siyahi shab ki chhat jae hatae zulf to mah ki bhi qismat hi badal jae khulen gar qissa-ha-e-khalwat-e-murshid muridon par nigahon se wo gir jaen 'aqidat hi badal jae 'ajab hai kaifiyat apni 'mudassir' muztarib hai dil mile koi to phir andar ki haalat hi badal jae

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ठहराव तो उस में था ही नहीं, रुकती थी निकल लिया करती थी मैं कपड़े बदलते सोचता था, वो मर्द बदल लिया करती थी मुझे अपने बनाए रास्तों पर भी जूते पहनना पड़ते थे वो लोगों के सीने पर भी जूते उतार कर चल लिया करती थी मेरे हाथ ज़बूँ हो जाते थे मेरे चश्में स्याह हो जाते थे मैं उस को नक़ाब का कहता था, वो कालिख मल लिया करती थी उस औरत ने बेज़ार किया, इक बार नहीं सौ बार किया गानों पे उछल नहीं पाती थी, बातों पे उछल लिया करती थी तारीक़ महल को शाहज़ादी ने रौशन रक्खा कनीज़ों से कभी उन को जला लिया करती थी कभी उन सेे जल लिया करती थी आदाब-ए-तिज़ारत से भी ना-वाक़िफ़ थी शेर-ओ-अदब की तरह मुझे वैसा प्यार नहीं देती थी जैसी ग़ज़ल लिया करती थी

Muzdum Khan

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मोहब्बत से मोहब्बत मिल गई जैसे कि सहरा में कली इक खिल गई जैसे न जाने कैसे तुम बिन जी रहा था मैं समझ लो हर घड़ी मुश्किल गई जैसे चली थी रेल इक सीटी बजाए बिन जो मेरे दिल से तेरे दिल गई जैसे न निकला लफ़्ज़ उस के रू-ब-रू मेरा मेरे वो होंठ दोनों सिल गई जैसे ग़ज़ल को मेरी तू ने गुनगुनाया जब लगा मेरी हाँ में हाँ मिल गई जैसे उसे इतना क़रीबी क्यो बनाया 'कब्क' गया इक शख़्स तो महफ़िल गई जैसे

Krishnakant Kabk

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हम अपने दुख को गाने लग गए हैं मगर इस में ज़माने लग गए हैं किसी की तर्बियत का है करिश्मा ये आँसू मुस्कुराने लग गए हैं कहानी रुख़ बदलना चाहती है नए किरदार आने लग गए हैं ये हासिल है मिरी ख़ामोशियों का कि पत्थर आज़माने लग गए हैं ये मुमकिन है किसी दिन तुम भी आओ परिंदे आने जाने लग गए हैं जिन्हें हम मंज़िलों तक ले के आए वही रस्ता बताने लग गए हैं शराफ़त रंग दिखलाती है 'दानिश' कई दुश्मन ठिकाने लग गए हैं

Madan Mohan Danish

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हर मंज़र पर जश्न मनाने नाचने गाने वाले लोग इक मुद्दत से चुप बैठे हैं शोर मचाने वाले लोग हम दोनों को समझाऍंगे डॉंटेंगे फटकारेंगे हम दोनों को कब समझेंगे ये समझाने वाले लोग इश्क़ क़ैस फ़रहाद रोमियो जैसे ही कर सकते हैं हम तो ठहरे दस से छह तक ऑफ़िस जाने वाले लोग कुछ चीज़ों का इस दुनिया में कोई नेमुल बदल नहीं है कैसे चाँद से काम चलाऍं तुझ को देखने वाले लोग

Vashu Pandey

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इश्क़ से जाम से बरसात से डर लगता है यार तुम क्या हो कि हर बात से डर लगता है इश्क़ है इश्क़ कोई खेल नहीं बच्चों का वो चला जाए जिसे मात से डर लगता है मैं तिरे हुस्न का शैदाई नहीं हो सकता रोज़ बँटती हुई ख़ैरात से डर लगता है हम ने हालात बदलने की दुआ माँगी थी अब बदलते हुए हालात से डर लगता है दिल तो करता है कि बारिश में नहाएँ 'यासिर' घर जो कच्चा हो तो बरसात से डर लगता है

Yasir Khan

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