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vahi phir mujhe yaad aane lage hain jinhen bhulne men zamane lage hain vo hain paas aur yaad aane lage hain mohabbat ke hosh ab thikane lage hain suna hai hamen vo bhulane lage hain to kya ham unhen yaad aane lage hain hatae the jo raah se doston ki vo patthar mire ghar men aane lage hain ye kahna tha un se mohabbat hai mujh ko ye kahne men mujh ko zamane lage hain havaen chalin aur na maujen hi utthin ab aise bhi tufan aane lage hain qayamat yaqinan qarib aa gai hai 'khumar' ab to masjid men jaane lage hain wahi phir mujhe yaad aane lage hain jinhen bhulne mein zamane lage hain wo hain pas aur yaad aane lage hain mohabbat ke hosh ab thikane lage hain suna hai hamein wo bhulane lage hain to kya hum unhen yaad aane lage hain hatae the jo rah se doston ki wo patthar mere ghar mein aane lage hain ye kahna tha un se mohabbat hai mujh ko ye kahne mein mujh ko zamane lage hain hawaen chalin aur na maujen hi utthin ab aise bhi tufan aane lage hain qayamat yaqinan qarib aa gai hai 'khumar' ab to masjid mein jaane lage hain

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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नहीं था अपना मगर फिर भी अपना अपना लगा किसी से मिल के बहुत देर बा'द अच्छा लगा तुम्हें लगा था मैं मर जाऊँगा तुम्हारे बग़ैर बताओ फिर तुम्हें मेरा मज़ाक़ कैसा लगा तिजोरियों पे नज़र और लोग रखते हैं मैं आसमान चुरा लूँगा जब भी मौक़ा लगा दिखाती है भरी अलमारियाँ बड़े दिल से बताती है कि मोहब्बत में किस का कितना लगा

Tehzeeb Hafi

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क्या ग़लतफ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं जाने कैसे राज़ सीने में लिए बैठा है वो ज़ह्र खा लेता है पर मुँह से उगलता कुछ नहीं शुक्र है कि उस ने मुझ सेे कह दिया कि कुछ तो है मैं उस सेे कहने ही वाला था कि अच्छा कुछ नहीं

Tehzeeb Hafi

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पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा मैं भीग जाऊँगा छतरी नहीं बनाऊँगा अगर ख़ुदा ने बनाने का इख़्तियार दिया अलम बनाऊँगा बर्छी नहीं बनाऊँगा फ़रेब दे के तिरा जिस्म जीत लूँ लेकिन मैं पेड़ काट के कश्ती नहीं बनाऊँगा गली से कोई भी गुज़रे तो चौंक उठता हूँ नए मकान में खिड़की नहीं बनाऊँगा मैं दुश्मनों से अगर जंग जीत भी जाऊँ तो उन की औरतें क़ैदी नहीं बनाऊँगा तुम्हें पता तो चले बे-ज़बान चीज़ का दुख मैं अब चराग़ की लौ ही नहीं बनाऊँगा मैं एक फ़िल्म बनाऊँगा अपने 'सरवत' पर और इस में रेल की पटरी नहीं बनाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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