ghazalKuch Alfaaz

वो कोई हुस्न है जिस हुस्न का चर्चा न हुआ उस का क्या इश्क़ है जो इश्क़ में रुस्वा न हुआ तेरा आना जो मिरे पास मसीहा न हुआ था जो बीमार किसी से मगर अच्छा न हुआ यूँँ तो मुश्ताक़ रहे कितना ही उस कूचे के पर गुज़र मेरे सिवा और किसी का न हुआ शायद आ जाए कभी देखने वो रश्क-ए-मसीह मैं किसी और से इस वास्ते अच्छा न हुआ शे'र कहते हुए इक उम्र हुई 'ताबाँ' को हाए अफ़्सोस कि इस काम मैं पुख़्ता न हुआ

Related Ghazal

सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

140 likes

चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

406 likes

क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

371 likes

ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

355 likes

मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

456 likes

More from Anwar Taban

कहीं चर्चा हमारा हो न जाए मोहब्बत आश्कारा हो न जाए कहीं उस का नज़ारा हो न जाए ये दिल क़ुर्बां हमारा हो न जाए न देखो तिरछी नज़रों से ख़ुदारा मिरा दिल पारा पारा हो न जाए न पड़ जाएँ जिगर के अपने लाले कहीं उस का इशारा हो न जाए न देखो प्यार की नज़रों से डर है हमारा दिल तुम्हारा हो न जाए फ़िदा दिल ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ पर तुम्हारी कहीं आफ़त का मारा हो न जाए तुम्हें दिल दे तो दे 'ताबाँ' ये डर है हमेशा को तुम्हारा हो न जाए

Anwar Taban

0 likes

बहार बन के मिरे हर नफ़स पे छाई हो अजब अदास मिरी ज़िंदगी में आई हो तुम्हारा हुस्न वो तस्वीर-ए-हुस्न-ए-कामिल है ख़ुदा ने ख़ास ही लम्हों में जो बनाई हो शराब है न सहर है मगर ये आलम है किसी ने जैसे निगाहों से मय पिलाई हो तिरी तरह ही गुरेज़ाँ है नींद भी मुझ से क़सम है तेरी जो अब तक क़रीब आई हो तू उस निगाह से पी वक़्त-ए-मय-कशी 'ताबाँ' की जिस निगाह पे क़ुर्बान पारसाई हो

Anwar Taban

0 likes

वफ़ा का मिरी क्या सिला दीजिएगा ग़म-ए-दिल की लज़्ज़त बढ़ा दीजिएगा मुझे देख कर मुस्कुरा दीजिएगा यूँँही मेरी हस्ती मिटा दीजिएगा सिला दिल लगाने का क्या दीजिएगा सितम दीजिएगा सज़ा दीजिएगा सुकूँ की तलब मुझ को हरगिज़ नहीं है बस इक दर्द का सिलसिला दीजिएगा ख़ुशी बाँटने के नहीं आप क़ाइल तो ग़म ही मुझे कुछ सिवा दीजिएगा मुझे क्या ख़बर थी कि ख़ुद लौह-ए-दिल पर मिरा नाम लिख कर मिटा दीजिएगा सुकून क़ल्ब को जिस से मिल जाए 'ताबाँ' ग़ज़ल कोई ऐसी सुना दीजिएगा

Anwar Taban

1 likes

ख़ुशी की बात और है ग़मों की बात और तुम्हारी बात और है हमारी बात और कोई अगर जफ़ा करे नहीं है कुछ गिला मुझे किसी की बात और है तुम्हारी बात और हुज़ूर सुन भी लीजिए छोड़ कर के जाइए ज़रा सी बात और है ज़रा सी बात और क़ितआ रुबाई और नज़्म ख़ूब-तर सहीह मगर ग़ज़ल की बात और है ग़ज़ल की बात और ज़बाँ से 'ताबाँ' मत कहो नज़र से इल्तिजा करो ज़बाँ की बात और है नज़र की बात और

Anwar Taban

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Anwar Taban.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Anwar Taban's ghazal.