ghazalKuch Alfaaz

बहार बन के मिरे हर नफ़स पे छाई हो अजब अदास मिरी ज़िंदगी में आई हो तुम्हारा हुस्न वो तस्वीर-ए-हुस्न-ए-कामिल है ख़ुदा ने ख़ास ही लम्हों में जो बनाई हो शराब है न सहर है मगर ये आलम है किसी ने जैसे निगाहों से मय पिलाई हो तिरी तरह ही गुरेज़ाँ है नींद भी मुझ से क़सम है तेरी जो अब तक क़रीब आई हो तू उस निगाह से पी वक़्त-ए-मय-कशी 'ताबाँ' की जिस निगाह पे क़ुर्बान पारसाई हो

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उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या मेरी हर बात बे-असर ही रही नक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं यही होता है ख़ानदान में क्या अपनी महरूमियाँ छुपाते हैं हम ग़रीबों की आन-बान में क्या ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से आ गया था मिरे गुमान में क्या शाम ही से दुकान-ए-दीद है बंद नहीं नुक़सान तक दुकान में क्या ऐ मिरे सुब्ह-ओ-शाम-ए-दिल की शफ़क़ तू नहाती है अब भी बान में क्या बोलते क्यूँँ नहीं मिरे हक़ में आबले पड़ गए ज़बान में क्या ख़ामुशी कह रही है कान में क्या आ रहा है मिरे गुमान में क्या दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या वो मिले तो ये पूछना है मुझे अब भी हूँ मैं तिरी अमान में क्या यूँँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूद ख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या ये मुझे चैन क्यूँँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या

Jaun Elia

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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

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यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है मिरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है न बस में ज़िंदगी उस के न क़ाबू मौत पर उस का मगर इंसान फिर भी कब ख़ुदा होने से डरता है अजब ये ज़िंदगी की क़ैद है दुनिया का हर इंसाँ रिहाई माँगता है और रिहा होने से डरता है

Rajesh Reddy

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ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद देखने वाले हाथ मलते हैं है वो जान अब हर एक महफ़िल की हम भी अब घर से कम निकलते हैं क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं है उसे दूर का सफ़र दर-पेश हम सँभाले नहीं सँभलते हैं तुम बनो रंग तुम बनो ख़ुश्बू हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं मैं उसी तरह तो बहलता हूँ और सब जिस तरह बहलते हैं है अजब फ़ैसले का सहरा भी चल न पड़िए तो पाँव जलते हैं

Jaun Elia

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तुझे ना आएंगी मुफ़लिस की मुश्किलात समझ मैं छोटे लोगों के घर का बड़ा हूँ बात समझ मेरे इलावा हैं छे लोग मुनहसीर मुझ पर मेरी हर एक मुसीबत को ज‌र्ब सात समझ दिल ओ दिमाग ज़रूरी हैं ज़िन्दगी के लिए ये हाथ पाऊँ इज़ाफ़ी सहूलियत समझ फ़लक से कट के ज़मीन पर गिरी पतंगें देख तू हिज्र काटने वालों की नफ़सियात समझ किताब-ए-इश्क़ में हर आह एक आयत है और आँसुओं को हुरूफ-ए-मुक़त्तेआत समझ

Umair Najmi

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वो कोई हुस्न है जिस हुस्न का चर्चा न हुआ उस का क्या इश्क़ है जो इश्क़ में रुस्वा न हुआ तेरा आना जो मिरे पास मसीहा न हुआ था जो बीमार किसी से मगर अच्छा न हुआ यूँँ तो मुश्ताक़ रहे कितना ही उस कूचे के पर गुज़र मेरे सिवा और किसी का न हुआ शायद आ जाए कभी देखने वो रश्क-ए-मसीह मैं किसी और से इस वास्ते अच्छा न हुआ शे'र कहते हुए इक उम्र हुई 'ताबाँ' को हाए अफ़्सोस कि इस काम मैं पुख़्ता न हुआ

Anwar Taban

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कहीं चर्चा हमारा हो न जाए मोहब्बत आश्कारा हो न जाए कहीं उस का नज़ारा हो न जाए ये दिल क़ुर्बां हमारा हो न जाए न देखो तिरछी नज़रों से ख़ुदारा मिरा दिल पारा पारा हो न जाए न पड़ जाएँ जिगर के अपने लाले कहीं उस का इशारा हो न जाए न देखो प्यार की नज़रों से डर है हमारा दिल तुम्हारा हो न जाए फ़िदा दिल ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ पर तुम्हारी कहीं आफ़त का मारा हो न जाए तुम्हें दिल दे तो दे 'ताबाँ' ये डर है हमेशा को तुम्हारा हो न जाए

Anwar Taban

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वफ़ा का मिरी क्या सिला दीजिएगा ग़म-ए-दिल की लज़्ज़त बढ़ा दीजिएगा मुझे देख कर मुस्कुरा दीजिएगा यूँँही मेरी हस्ती मिटा दीजिएगा सिला दिल लगाने का क्या दीजिएगा सितम दीजिएगा सज़ा दीजिएगा सुकूँ की तलब मुझ को हरगिज़ नहीं है बस इक दर्द का सिलसिला दीजिएगा ख़ुशी बाँटने के नहीं आप क़ाइल तो ग़म ही मुझे कुछ सिवा दीजिएगा मुझे क्या ख़बर थी कि ख़ुद लौह-ए-दिल पर मिरा नाम लिख कर मिटा दीजिएगा सुकून क़ल्ब को जिस से मिल जाए 'ताबाँ' ग़ज़ल कोई ऐसी सुना दीजिएगा

Anwar Taban

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ख़ुशी की बात और है ग़मों की बात और तुम्हारी बात और है हमारी बात और कोई अगर जफ़ा करे नहीं है कुछ गिला मुझे किसी की बात और है तुम्हारी बात और हुज़ूर सुन भी लीजिए छोड़ कर के जाइए ज़रा सी बात और है ज़रा सी बात और क़ितआ रुबाई और नज़्म ख़ूब-तर सहीह मगर ग़ज़ल की बात और है ग़ज़ल की बात और ज़बाँ से 'ताबाँ' मत कहो नज़र से इल्तिजा करो ज़बाँ की बात और है नज़र की बात और

Anwar Taban

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