ख़ुशी की बात और है ग़मों की बात और तुम्हारी बात और है हमारी बात और कोई अगर जफ़ा करे नहीं है कुछ गिला मुझे किसी की बात और है तुम्हारी बात और हुज़ूर सुन भी लीजिए छोड़ कर के जाइए ज़रा सी बात और है ज़रा सी बात और क़ितआ रुबाई और नज़्म ख़ूब-तर सहीह मगर ग़ज़ल की बात और है ग़ज़ल की बात और ज़बाँ से 'ताबाँ' मत कहो नज़र से इल्तिजा करो ज़बाँ की बात और है नज़र की बात और
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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं
Dagh Dehlvi
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो
Jawwad Sheikh
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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है
Ali Zaryoun
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बात ऐसी है ऐसा था पहले दर्द होने पे रोता था पहले जैसे चाहे वो खेला करता था मैं किसी का खिलौना था पहले तुझ पे कितना भरोसा करता था ख़ुद पे कितना भरोसा था पहले आख़िरी रास्ते पे चलने को पैर उस ने उठाया था पहले अब तो तस्वीर तक नहीं बनती मैं तो पैकर बनाता था पहले रौशनी आई जब जला कोई सबकी आँखों पे पर्दा था पहले गिनती पीछे से की गई वरना मेरा नंबर तो पहला था पहले
Himanshi babra KATIB
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कहीं चर्चा हमारा हो न जाए मोहब्बत आश्कारा हो न जाए कहीं उस का नज़ारा हो न जाए ये दिल क़ुर्बां हमारा हो न जाए न देखो तिरछी नज़रों से ख़ुदारा मिरा दिल पारा पारा हो न जाए न पड़ जाएँ जिगर के अपने लाले कहीं उस का इशारा हो न जाए न देखो प्यार की नज़रों से डर है हमारा दिल तुम्हारा हो न जाए फ़िदा दिल ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ पर तुम्हारी कहीं आफ़त का मारा हो न जाए तुम्हें दिल दे तो दे 'ताबाँ' ये डर है हमेशा को तुम्हारा हो न जाए
Anwar Taban
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वो कोई हुस्न है जिस हुस्न का चर्चा न हुआ उस का क्या इश्क़ है जो इश्क़ में रुस्वा न हुआ तेरा आना जो मिरे पास मसीहा न हुआ था जो बीमार किसी से मगर अच्छा न हुआ यूँँ तो मुश्ताक़ रहे कितना ही उस कूचे के पर गुज़र मेरे सिवा और किसी का न हुआ शायद आ जाए कभी देखने वो रश्क-ए-मसीह मैं किसी और से इस वास्ते अच्छा न हुआ शे'र कहते हुए इक उम्र हुई 'ताबाँ' को हाए अफ़्सोस कि इस काम मैं पुख़्ता न हुआ
Anwar Taban
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बहार बन के मिरे हर नफ़स पे छाई हो अजब अदास मिरी ज़िंदगी में आई हो तुम्हारा हुस्न वो तस्वीर-ए-हुस्न-ए-कामिल है ख़ुदा ने ख़ास ही लम्हों में जो बनाई हो शराब है न सहर है मगर ये आलम है किसी ने जैसे निगाहों से मय पिलाई हो तिरी तरह ही गुरेज़ाँ है नींद भी मुझ से क़सम है तेरी जो अब तक क़रीब आई हो तू उस निगाह से पी वक़्त-ए-मय-कशी 'ताबाँ' की जिस निगाह पे क़ुर्बान पारसाई हो
Anwar Taban
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वफ़ा का मिरी क्या सिला दीजिएगा ग़म-ए-दिल की लज़्ज़त बढ़ा दीजिएगा मुझे देख कर मुस्कुरा दीजिएगा यूँँही मेरी हस्ती मिटा दीजिएगा सिला दिल लगाने का क्या दीजिएगा सितम दीजिएगा सज़ा दीजिएगा सुकूँ की तलब मुझ को हरगिज़ नहीं है बस इक दर्द का सिलसिला दीजिएगा ख़ुशी बाँटने के नहीं आप क़ाइल तो ग़म ही मुझे कुछ सिवा दीजिएगा मुझे क्या ख़बर थी कि ख़ुद लौह-ए-दिल पर मिरा नाम लिख कर मिटा दीजिएगा सुकून क़ल्ब को जिस से मिल जाए 'ताबाँ' ग़ज़ल कोई ऐसी सुना दीजिएगा
Anwar Taban
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