वफ़ा का मिरी क्या सिला दीजिएगा ग़म-ए-दिल की लज़्ज़त बढ़ा दीजिएगा मुझे देख कर मुस्कुरा दीजिएगा यूँँही मेरी हस्ती मिटा दीजिएगा सिला दिल लगाने का क्या दीजिएगा सितम दीजिएगा सज़ा दीजिएगा सुकूँ की तलब मुझ को हरगिज़ नहीं है बस इक दर्द का सिलसिला दीजिएगा ख़ुशी बाँटने के नहीं आप क़ाइल तो ग़म ही मुझे कुछ सिवा दीजिएगा मुझे क्या ख़बर थी कि ख़ुद लौह-ए-दिल पर मिरा नाम लिख कर मिटा दीजिएगा सुकून क़ल्ब को जिस से मिल जाए 'ताबाँ' ग़ज़ल कोई ऐसी सुना दीजिएगा
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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई
Jaun Elia
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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं
Dagh Dehlvi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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वो कोई हुस्न है जिस हुस्न का चर्चा न हुआ उस का क्या इश्क़ है जो इश्क़ में रुस्वा न हुआ तेरा आना जो मिरे पास मसीहा न हुआ था जो बीमार किसी से मगर अच्छा न हुआ यूँँ तो मुश्ताक़ रहे कितना ही उस कूचे के पर गुज़र मेरे सिवा और किसी का न हुआ शायद आ जाए कभी देखने वो रश्क-ए-मसीह मैं किसी और से इस वास्ते अच्छा न हुआ शे'र कहते हुए इक उम्र हुई 'ताबाँ' को हाए अफ़्सोस कि इस काम मैं पुख़्ता न हुआ
Anwar Taban
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बहार बन के मिरे हर नफ़स पे छाई हो अजब अदास मिरी ज़िंदगी में आई हो तुम्हारा हुस्न वो तस्वीर-ए-हुस्न-ए-कामिल है ख़ुदा ने ख़ास ही लम्हों में जो बनाई हो शराब है न सहर है मगर ये आलम है किसी ने जैसे निगाहों से मय पिलाई हो तिरी तरह ही गुरेज़ाँ है नींद भी मुझ से क़सम है तेरी जो अब तक क़रीब आई हो तू उस निगाह से पी वक़्त-ए-मय-कशी 'ताबाँ' की जिस निगाह पे क़ुर्बान पारसाई हो
Anwar Taban
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कहीं चर्चा हमारा हो न जाए मोहब्बत आश्कारा हो न जाए कहीं उस का नज़ारा हो न जाए ये दिल क़ुर्बां हमारा हो न जाए न देखो तिरछी नज़रों से ख़ुदारा मिरा दिल पारा पारा हो न जाए न पड़ जाएँ जिगर के अपने लाले कहीं उस का इशारा हो न जाए न देखो प्यार की नज़रों से डर है हमारा दिल तुम्हारा हो न जाए फ़िदा दिल ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ पर तुम्हारी कहीं आफ़त का मारा हो न जाए तुम्हें दिल दे तो दे 'ताबाँ' ये डर है हमेशा को तुम्हारा हो न जाए
Anwar Taban
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ख़ुशी की बात और है ग़मों की बात और तुम्हारी बात और है हमारी बात और कोई अगर जफ़ा करे नहीं है कुछ गिला मुझे किसी की बात और है तुम्हारी बात और हुज़ूर सुन भी लीजिए छोड़ कर के जाइए ज़रा सी बात और है ज़रा सी बात और क़ितआ रुबाई और नज़्म ख़ूब-तर सहीह मगर ग़ज़ल की बात और है ग़ज़ल की बात और ज़बाँ से 'ताबाँ' मत कहो नज़र से इल्तिजा करो ज़बाँ की बात और है नज़र की बात और
Anwar Taban
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