ghazalKuch Alfaaz

वही आँगन वही खिड़की वही दर याद आता है अकेला जब भी होता हूँ मुझे घर याद आता है मिरी बे-साख़्ता हिचकी मुझे खुल कर बताती है तिरे अपनों को गाँव में तो अक्सर याद आता है जो अपने पास हों उन की कोई क़ीमत नहीं होती हमारे भाई को ही लो बिछड़ कर याद आता है सफलता के सफ़र में तो कहाँ फ़ुर्सत कि कुछ सोचें मगर जब चोट लगती है मुक़द्दर याद आता है मई और जून की गर्मी बदन से जब टपकती है नवम्बर याद आता है दिसम्बर याद आता है

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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किसी और ने तो बुना नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ तिरे आसमाँ से जुदा नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ ये ज़मीन मेरी ज़मीन है ये जहान मेरा जहान है किसी दूसरे से मिला नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ कहीं धूप है कहीं चाँदनी कहीं रंग है कहीं रौशनी कहीं आँसुओं से धुला नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ उसे छू सकूँ ये जुनून है मेरी रूह को ये सुकून है यहाँ कब किसी का हुआ नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ गिरीं बिजलियाँ मेरी राह पर कई आँधियाँ भी चलीं मगर कभी बादलों सा झुका नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ

Aalok Shrivastav

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घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी कभी बड़ा सा हाथ-ख़र्च थे कभी हथेली की सूजन मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी

Aalok Shrivastav

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हमेशा ज़िंदगी की हर कमी को जीते रहते हैं जिसे हम जी नहीं पाए उसी को जीते रहते हैं हमारे दुख की बारिश को कोई दामन नहीं मिलता हमारी आँख के बादल नमी को जीते रहते हैं किसी के साथ हैं रस्में किसी के साथ हैं क़स में किसी के साथ जीना है किसी को जीते रहते हैं हमें मा'लूम है इक दिन भरोसा टूट जाएगा मगर फिर भी सराबों में नदी को जीते रहते हैं हमारे साथ चलती है तुम्हारे प्यार की ख़ुशबू लगाई थी जो तुम ने उस लगी को जीते रहते हैं चहकते घर महकते खेत और वो गाँव की गलियाँ जिन्हें हम छोड़ आए उन सभी को जीते रहते है ख़ुदा के नाम-लेवा हम भी हैं तुम भी हो और वो भी मगर अफ़सोस सब अपनी ख़ुदी को जीते रहते हैं

Aalok Shrivastav

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ठीक हुआ जो बिक गए सैनिक मुट्ठी भर दीनारों में वैसे भी तो ज़ंग लगा था पुश्तैनी हथियारों में सर्द नसों में चलते चलते गर्म लहू जब बर्फ़ हुआ चार पड़ोसी जिस्म उठा कर झोंक आए अंगारों में खेतों को मुट्ठी में भरना अब तक सीख नहीं पाया यूँँ तो मेरा जीवन बीता सामंती अय्यारों में कैसे उस के चाल-चलन में अंग्रेज़ी अंदाज़ न हो आख़िर उस ने साँसें लीं हैं पच्छिम के दरबारों में नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती है सोच-समझ कर घुलना-मिलना अपने रिश्ते-दारों में चाँद अगर पूरा चमके तो उस के दाग़ खटकते हैं एक न एक बुराई तय है सारे इज़्ज़त-दारों में

Aalok Shrivastav

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तुम्हारे पास आते हैं तो साँसें भीग जाती हैं मोहब्बत इतनी मिलती है कि आँखें भीग जाती हैं तबस्सुम इत्र जैसा है हँसी बरसात जैसी है वो जब भी बात करती है तो बातें भीग जाती हैं तुम्हारी याद से दिल में उजाला होने लगता है तुम्हें जब गुनगुनाता हूँ तो रातें भीग जाती हैं ज़मीं की गोद भरती है तो क़ुदरत भी चहकती है नए पत्तों की आहट से भी शाख़ें भीग जाती हैं तिरे एहसास की ख़ुशबू हमेशा ताज़ा रहती है तिरी रहमत की बारिश से मुरादें भीग जाती हैं

Aalok Shrivastav

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