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किसी और ने तो बुना नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ तिरे आसमाँ से जुदा नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ ये ज़मीन मेरी ज़मीन है ये जहान मेरा जहान है किसी दूसरे से मिला नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ कहीं धूप है कहीं चाँदनी कहीं रंग है कहीं रौशनी कहीं आँसुओं से धुला नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ उसे छू सकूँ ये जुनून है मेरी रूह को ये सुकून है यहाँ कब किसी का हुआ नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ गिरीं बिजलियाँ मेरी राह पर कई आँधियाँ भी चलीं मगर कभी बादलों सा झुका नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी कभी बड़ा सा हाथ-ख़र्च थे कभी हथेली की सूजन मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी

Aalok Shrivastav

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ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम बच कर चले हमेशा मगर क़ाफ़िलों से हम होने को फिर शिकार नई उलझनों से हम मिलते हैं रोज़ अपने कई दोस्तों से हम बरसों फ़रेब खाते रहे दूसरों से हम अपनी समझ में आए बड़ी मुश्किलों से हम मंज़िल की है तलब तो हमें साथ ले चलो वाक़िफ़ हैं ख़ूब राह की बारीकियों से हम जिन के परों पे सुब्ह की ख़ुशबू के रंग हैं बचपन उधार लाए हैं उन तितलियों से हम कुछ तो हमारे बीच कभी दूरियाँ भी हों तंग आ गए हैं रोज़ की नज़दीकियों से हम गुज़रें हमारे घर की किसी रहगुज़र से वो पर्दे हटाएँ देखें उन्हें खिड़कियों से हम जब भी कहा कि याद हमारी कहाँ उन्हें पकड़े गए हैं ठीक तभी हिचकियों से हम

Aalok Shrivastav

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ठीक हुआ जो बिक गए सैनिक मुट्ठी भर दीनारों में वैसे भी तो ज़ंग लगा था पुश्तैनी हथियारों में सर्द नसों में चलते चलते गर्म लहू जब बर्फ़ हुआ चार पड़ोसी जिस्म उठा कर झोंक आए अंगारों में खेतों को मुट्ठी में भरना अब तक सीख नहीं पाया यूँँ तो मेरा जीवन बीता सामंती अय्यारों में कैसे उस के चाल-चलन में अंग्रेज़ी अंदाज़ न हो आख़िर उस ने साँसें लीं हैं पच्छिम के दरबारों में नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती है सोच-समझ कर घुलना-मिलना अपने रिश्ते-दारों में चाँद अगर पूरा चमके तो उस के दाग़ खटकते हैं एक न एक बुराई तय है सारे इज़्ज़त-दारों में

Aalok Shrivastav

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वही आँगन वही खिड़की वही दर याद आता है अकेला जब भी होता हूँ मुझे घर याद आता है मिरी बे-साख़्ता हिचकी मुझे खुल कर बताती है तिरे अपनों को गाँव में तो अक्सर याद आता है जो अपने पास हों उन की कोई क़ीमत नहीं होती हमारे भाई को ही लो बिछड़ कर याद आता है सफलता के सफ़र में तो कहाँ फ़ुर्सत कि कुछ सोचें मगर जब चोट लगती है मुक़द्दर याद आता है मई और जून की गर्मी बदन से जब टपकती है नवम्बर याद आता है दिसम्बर याद आता है

Aalok Shrivastav

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तू वफ़ा कर के भूल जा मुझ को अब ज़रा यूँँ भी आज़मा मुझ को ये ज़माना बुरा नहीं है मगर अपनी नज़रों से देखना मुझ को बे-सदा काग़ज़ों में आग लगा आज की रात गुनगुना मुझ को तुझ को किस किस में ढूँढ़ता आख़िर तू भी किस किस से माँगता मुझ को अब किसी और का पुजारी है जिस ने माना था देवता मुझ को

Aalok Shrivastav

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