वो जो इक शख़्स वहाँ है वो यहाँ कैसे हो हिज्र पर वस्ल की हालत का गुमाँ कैसे हो बे-नुमू ख़्वाब में पैवस्त जड़ें हैं मेरी एक गमले में कोई नख़्ल जवाँ कैसे हो तुम तो अल्फ़ाज़ के नश्तर से भी मर जाते थे अब जो हालात हैं ऐ अहल-ए-ज़बाँ कैसे हो आँख के पहले किनारे पे खड़ा आख़िरी अश्क रंज के रहम-ओ-करम पर है रवाँ कैसे हो भाव-ताव में कमी बेशी नहीं हो सकती हाँ मगर तुझ से ख़रीदार को नाँ कैसे हो मिलते रहते हैं मुझे आज भी 'ग़ालिब' के ख़ुतूत वही अंदाज़-ए-तख़ातुब कि मियाँ कैसे हो
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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तभी तो मैं मोहब्बत का हवालाती नहीं होता यहाँ अपने सिवा कोई मुलाक़ाती नहीं होता गिरफ़्तार-ए-वफ़ा रोने का कोई एक मौसम रख जो नाला रोज़ बह निकले वो बरसाती नहीं होता बिछड़ने का इरादा है तो मुझ से मशवरा कर लो मोहब्बत में कोई भी फ़ैसला ज़ाती नहीं होता तुम्हें दिल में जगह दी थी नज़र से दूर क्या करते जो मरकज़ में ठहर जाए मज़ाफ़ाती नहीं होता
Afzal Khan
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मुझे रोना नहीं आवाज़ भी भारी नहीं करनी मोहब्बत की कहानी में अदाकारी नहीं करनी हवा के ख़ौफ़ से लिपटा हुआ हूँ ख़ुश्क टहनी से कहीं जाना नहीं जाने की तय्यारी नहीं करनी तहम्मुल ऐ मोहब्बत हिज्र पथरीला इलाक़ा है तुझे इस रास्ते पर तेज़-रफ़्तारी नहीं करनी हमारा दिल ज़रा उकता गया था घर में रह रह कर यूँँही बाज़ार आए हैं ख़रीदारी नहीं करनी ग़ज़ल को कम-निगाहों की पहुँच से दूर रखता हूँ मुझे बंजर दिमाग़ों में शजर-कारी नहीं करनी वसिय्यत की थी मुझ को क़ैस ने सहरा के बारे में ये मेरा घर है इस की चार-दीवारी नहीं करनी
Afzal Khan
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तभी तो मैं मोहब्बत का हवालाती नहीं होता यहाँ अपने सिवा कोई मुलाक़ाती नहीं होता गिरफ़्तार-ए-वफ़ा रोने का कोई एक मौसम रख जो नाला रोज़ बह निकले वो बरसाती नहीं होता बिछड़ने का इरादा है तो मुझ से मशवरा कर लो मोहब्बत में कोई भी फ़ैसला ज़ाती नहीं होता तुम्हें दिल में जगह दी थी नज़र से दूर क्या करते जो मरकज़ में ठहर जाए मज़ाफ़ाती नहीं होता
Afzal Khan
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शिकस्त-ए-ज़िंदगी वैसे भी मौत ही है ना तो सच बता ये मुलाक़ात आख़िरी है ना कहा नहीं था मिरा जिस्म और भर यारब सो अब ये ख़ाक तिरे पास बच गई है ना तू मेरे हाल से अंजान कब है ऐ दुनिया जो बात कह नहीं पाया समझ रही है ना इसी लिए हमें एहसास-ए-जुर्म है शायद अभी हमारी मोहब्बत नई नई है ना ये कोर-चश्म उजालों से इश्क़ करते हैं जो घर जला के भी कहते हैं रौशनी है ना मैं ख़ुद भी यार तुझे भूलने के हक़ में हूँ मगर जो बीच में कम-बख़्त शाएरी है ना मैं जान-बूझ के आया था तेग़ और तिरे बीच मियाँ निभानी तो पड़ती है दोस्ती है ना
Afzal Khan
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आज ही फ़ुर्सत से कल का मसअला छेड़ूँगा मैं मसअला हल हो तो हल का मसअला छेड़ूँगा मैं वस्ल ओ हिज्राँ में तनासुब रास्त होना चाहिए इश्क़ के रद्द-ए-अमल का मसअला छेड़ूँगा मैं देखना सब लोग मुझ को ख़ारिजी ठहराएँगे कल यहाँ जंग-ए-जमल का मसअला छेड़ूँगा मैं कश्तियों वाले मुझे तावान दे कर पार जाएँ वर्ना लहरों में ख़लल का मसअला छेड़ूँगा मैं मिल ही जाएँगे कहीं तो मुझ को 'बेदिल-हैदरी' कूज़ा-गर वाली ग़ज़ल का मसअला छेड़ूँगा मैं इस शजर की एक टहनी परले आँगन में भी है अपने हम-साए से फल का मसअला छेड़ूँगा मैं
Afzal Khan
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