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वो सर-फिरी हवा थी सँभलना पड़ा मुझे मैं आख़िरी चराग़ था जलना पड़ा मुझे महसूस कर रहा था उसे अपने आस पास अपना ख़याल ख़ुद ही बदलना पड़ा मुझे सूरज ने छुपते छुपते उजागर किया तो था लेकिन तमाम रात पिघलना पड़ा मुझे मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू थी मिरी ख़ामुशी कहीं जो ज़हर पी चुका था उगलना पड़ा मुझे कुछ दूर तक तो जैसे कोई मेरे साथ था फिर अपने साथ आप ही चलना पड़ा मुझे

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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फ़िक्र-ए-ग़ुर्बत है न अंदेशा-ए-तन्हाई है ज़िंदगी कितने हवादिस से गुज़र आई है लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है हम न सुक़रात न मंसूर न ईसा लेकिन जो भी क़ातिल है हमारा ही तमन्नाई है ज़िंदगी और हैं कितने तिरे चेहरे ये बता तुझ से इक उम्र की हालाँकि शनासाई है कौन ना-वाक़िफ़-ए-अंजाम-ए-तबस्सुम है 'अमीर' मेरे हालात पे ये किस को हँसी आई है

Ameer Qazalbash

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मेरी पहचान है क्या मेरा पता दे मुझ को कोई आईना अगर है तो दिखा दे मुझ को तुझ से मिलता हूँ तो अक्सर ये ख़याल आता है इस बुलंदी से अगर कोई गिरा दे मुझ को कब से पत्थर की चट्टानों में हूँ गुमनाम ओ असीर देवताओं की तरह कोई जगा दे मुझ को एक आईना सर-ए-राह लिए बैठा हूँ जुर्म ऐसा है कि हर शख़्स सज़ा दे मुझ को इन अँधेरों में अकेला ही जलूँगा कब तक कोई शय तू भी तो ख़ुर्शीद-नुमा दे मुझ को

Ameer Qazalbash

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ख़ौफ़ बन कर ये ख़याल आता है अक्सर मुझ को दश्त कर जाएगा इक रोज़ समुंदर मुझ को मैं सरापा हूँ ख़बर-नामा-ए-इमरोज़-ए-जहाँ कल भुला दे न ये दुनिया कहीं पढ़ कर मुझ को हर नफ़स मुझ में तग़य्युर की हवाए लर्ज़ां मुर्तसिम कर न सका कोई भी मंज़र मुझ को अपने साहिल पे मैं ख़ुद तिश्ना-दहन बैठा हूँ देख दरिया की तराई से निकल कर मुझ को मिरे साए में भी मुझ को नहीं रहने देगा मेरे ही घर में रखेगा कोई बे-घर मुझ को कार-गर कोई भी तदबीर न होने देगा क्या मुक़द्दर है कि ले जाएगा दर-दर मुझ को काम आएगी न बेदार-निगाही भी 'अमीर' ख़्वाब कह जाएगा इक दिन मिरा पैकर मुझ को

Ameer Qazalbash

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मिरे हाल पर मेहरबानी करे ख़ुदा से कहो हुक्म-ए-सानी करे मैं इक बूँद पानी बड़ी चीज़ हूँ समुंदर मिरी पासबानी करे पढ़ें लोग तहरीर-ए-दीवार ओ दर ख़ुलासा मिरी बे-ज़बानी करे अज़ल से मैं उस के तआक़ुब में हूँ जो लम्हा मुझे ग़ैर-फ़ानी करे वो बख़्शे उजाले किसी सुब्ह को कोई शाम रौशन सुहानी करे मिरे साए में सब हैं मेरे सिवा कोई तो मिरी साएबानी करे कोई है जो बढ़ के उठा ले 'अमीर' वो तेशा जो पत्थर को पानी करे

Ameer Qazalbash

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हर गाम हादसा है ठहर जाइए जनाब रस्ता अगर हो याद तो घर जाइए जनाब ज़िंदा हक़ीक़तों के तलातुम हैं सामने ख़्वाबों की कश्तियों से उतर जाइए जनाब इंसाफ़ की सलीब हूँ सच्चाइयों का ज़हर मुझ से मिले बग़ैर गुज़र जाइए जनाब दिन का सफ़र तो कट गया सूरज के साथ साथ अब शब की अंजुमन में बिखर जाइए जनाब कोई चुरा के ले गया सदियों का ए'तिक़ाद मिम्बर की सीढ़ियों से उतर जाइए जनाब

Ameer Qazalbash

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