मिरे हाल पर मेहरबानी करे ख़ुदा से कहो हुक्म-ए-सानी करे मैं इक बूँद पानी बड़ी चीज़ हूँ समुंदर मिरी पासबानी करे पढ़ें लोग तहरीर-ए-दीवार ओ दर ख़ुलासा मिरी बे-ज़बानी करे अज़ल से मैं उस के तआक़ुब में हूँ जो लम्हा मुझे ग़ैर-फ़ानी करे वो बख़्शे उजाले किसी सुब्ह को कोई शाम रौशन सुहानी करे मिरे साए में सब हैं मेरे सिवा कोई तो मिरी साएबानी करे कोई है जो बढ़ के उठा ले 'अमीर' वो तेशा जो पत्थर को पानी करे
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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे
Umair Najmi
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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अगर तू बे-वफ़ा है ध्यान रखना मुझे सब कुछ पता है ध्यान रखना बिछड़ते वक़्त हम ने कह दिया था हमारा दिल दुखा है ध्यान रखना ख़ुदा जिस की मोहब्बत में बनी हो वो कइयों का ख़ुदा है ध्यान रखना जिसे तुम दोस्त केवल जानती हो वो तुम को चाहता है ध्यान रखना
Anand Raj Singh
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फ़िक्र-ए-ग़ुर्बत है न अंदेशा-ए-तन्हाई है ज़िंदगी कितने हवादिस से गुज़र आई है लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है हम न सुक़रात न मंसूर न ईसा लेकिन जो भी क़ातिल है हमारा ही तमन्नाई है ज़िंदगी और हैं कितने तिरे चेहरे ये बता तुझ से इक उम्र की हालाँकि शनासाई है कौन ना-वाक़िफ़-ए-अंजाम-ए-तबस्सुम है 'अमीर' मेरे हालात पे ये किस को हँसी आई है
Ameer Qazalbash
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मेरी पहचान है क्या मेरा पता दे मुझ को कोई आईना अगर है तो दिखा दे मुझ को तुझ से मिलता हूँ तो अक्सर ये ख़याल आता है इस बुलंदी से अगर कोई गिरा दे मुझ को कब से पत्थर की चट्टानों में हूँ गुमनाम ओ असीर देवताओं की तरह कोई जगा दे मुझ को एक आईना सर-ए-राह लिए बैठा हूँ जुर्म ऐसा है कि हर शख़्स सज़ा दे मुझ को इन अँधेरों में अकेला ही जलूँगा कब तक कोई शय तू भी तो ख़ुर्शीद-नुमा दे मुझ को
Ameer Qazalbash
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हर गाम हादसा है ठहर जाइए जनाब रस्ता अगर हो याद तो घर जाइए जनाब ज़िंदा हक़ीक़तों के तलातुम हैं सामने ख़्वाबों की कश्तियों से उतर जाइए जनाब इंसाफ़ की सलीब हूँ सच्चाइयों का ज़हर मुझ से मिले बग़ैर गुज़र जाइए जनाब दिन का सफ़र तो कट गया सूरज के साथ साथ अब शब की अंजुमन में बिखर जाइए जनाब कोई चुरा के ले गया सदियों का ए'तिक़ाद मिम्बर की सीढ़ियों से उतर जाइए जनाब
Ameer Qazalbash
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दिल में बे-नाम सी ख़ुशी है अभी ज़िंदगी मेरे काम की है अभी मैं भी तुझ से बिछड़ के सरगर्दां तेरी आँखों में भी नमी है अभी दिल की सुनसान रहगुज़ारों पर मैं ने इक चीख़ सी सुनी है अभी मैं ने माना बहुत अँधेरा है फिर भी थोड़ी सी रौशनी है अभी अपने आँसू 'अमीर' क्यूँँ पोंछूँ इन चराग़ों में रौशनी है अभी
Ameer Qazalbash
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पाईं हर एक राह-गुज़र पर उदासियाँ निकली हुई हैं कब से सफ़र पर उदासियाँ ख़्वाबीदा शहर जागने वाला है लौट आओ बैठी हुई हैं शाम से घर पर उदासियाँ मैं ख़ौफ़ से लरज़ता रहा पढ़ नहीं सका फैली हुई थीं एक ख़बर पर उदासियाँ सूरज के हाथ सब्ज़ क़बाओं तक आ गए अब हैं यहाँ हर एक शजर पर उदासियाँ अपने भी ख़त्त-ओ-ख़ाल निगाहों में अब नहीं इस तरह छा गई हैं नज़र पर उदासियाँ फैला रहा है कौन कभी सोचता हूँ मैं ख़्वाबों के एक एक नगर पर उदासियाँ सब लोग बन गए हैं अगर अजनबी तो क्या छोड़ आएँगी मुझे मिरे दर पर उदासियाँ
Ameer Qazalbash
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