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वो ज़माना नज़र नहीं आता कुछ ठिकाना नज़र नहीं आता जान जाती दिखाई देती है उन का आना नज़र नहीं आता इश्क़ दर-पर्दा फूँकता है आग ये जलाना नज़र नहीं आता इक ज़माना मिरी नज़र में रहा इक ज़माना नज़र नहीं आता दिल ने इस बज़्म में बिठा तो दिया उठ के जाना नज़र नहीं आता रहिए मुश्ताक़-ए-जल्वा-ए-दीदार हम ने माना नज़र नहीं आता ले चलो मुझ को राह-रवान-ए-अदम याँ ठिकाना नज़र नहीं आता दिल पे बैठा कहाँ से तीर-ए-निगाह ये निशाना नज़र नहीं आता तुम मिलाओगे ख़ाक में हम को दिल मिलाना नज़र नहीं आता आप ही देखते हैं हम को तो दिल का आना नज़र नहीं आता दिल-ए-पुर-आरज़ू लुटा ऐ 'दाग़' वो ख़ज़ाना नज़र नहीं आता

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं सुनसान घर ये क्यूँँ न हो मेहमान तो गया क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया बज़्म-ए-अदू में सूरत-ए-परवाना दिल मिरा गो रश्क से जला तिरे क़ुर्बान तो गया होश ओ हवा से ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया

Dagh Dehlvi

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राह पर उन को लगा लाए तो हैं बातों में और खुल जाएँगे दो चार मुलाक़ातों में ये भी तुम जानते हो चंद मुलाक़ातों में आज़माया है तुम्हें हम ने कई बातों में ग़ैर के सर की बलाएँ जो नहीं लें ज़ालिम क्या मिरे क़त्ल को भी जान नहीं हाथों में अब्र-ए-रहमत ही बरसता नज़र आया ज़ाहिद ख़ाक उड़ती कभी देखी न ख़राबातों में यारब उस चाँद के टुकड़े को कहाँ से लाऊँ रौशनी जिस की हो इन तारों भरी रातों में तुम्हीं इंसाफ़ से ऐ हज़रत नासेह कह दो लुत्फ़ उन बातों में आता है कि इन बातों में दौड़ कर दस्त-ए-दुआ' साथ दुआ के जाते हाए पैदा न हुए पाँव मिरे हाथों में जल्वा-ए-यार से जब बज़्म में ग़श आया है तो रक़ीबों ने सँभाला है मुझे हाथों में ऐसी तक़रीर सुनी थी न कभी शोख़-ओ-शरीर तेरी आँखों के भी फ़ित्ने हैं तिरी बातों में हम से इनकार हुआ ग़ैर से इक़रार हुआ फ़ैसला ख़ूब किया आप ने दो बातों में हफ़्त अफ़्लाक हैं लेकिन नहीं खुलता ये हिजाब कौन सा दुश्मन-ए-उश्शाक़ हैं इन सातों में और सुनते अभी रिंदों से जनाब-ए-वाइज़ चल दिए आप तो दो-चार सलावातों में हम ने देखा उन्हीं लोगों को तिरा दम भरते जिन की शोहरत थी ये हरगिज़ नहीं इन बातों में भेजे देता है उन्हें इश्क़ मता-ए-दिल-ओ-जाँ एक सरकार लुटी जाती है सौग़ातों में दिल कुछ आगाह तो हो शेवा-ए-अय्यारी से इस लिए आप हम आते हैं तिरी घातों में वस्ल कैसा वो किसी तरह बहलते ही न थे शाम से सुब्ह हुई उन की मुदारातों में वो गए दिन जो रहे याद बुतों की ऐ 'दाग़' रात भर अब तो गुज़रती है मुनाजातों में

Dagh Dehlvi

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इन आँखों ने क्या क्या तमाशा न देखा हक़ीक़त में जो देखना था न देखा तुझे देख कर वो दुई उठ गई है कि अपना भी सानी न देखा न देखा उन आँखों के क़ुर्बान जाऊँ जिन्हों ने हज़ारों हिजाबों में परवाना देखा न हिम्मत न क़िस्मत न दिल है न आँखें न ढूँडा न पाया न समझा न देखा मरीज़ान-ए-उल्फ़त की क्या बे-कसी है मसीहा को भी चारा-फ़रमा न देखा बहुत दर्द-मंदों को देखा है तू ने ये सीना ये दिल ये कलेजा न देखा वो कब देख सकता है उस की तजल्ली जिस इंसान ने अपना ही जल्वा न देखा बहुत शोर सुनते थे इस अंजुमन का यहाँ आ के जो कुछ सुना था न देखा सफ़ाई है बाग़-ए-मोहब्बत में ऐसी कि बाद-ए-सबा ने भी तिनका न देखा उसे देख कर और को फिर जो देखे कोई देखने वाला ऐसा न देखा वो था जल्वा-आरा मगर तू ने मूसा न देखा न देखा न देखा न देखा गया कारवाँ छोड़ कर मुझ को तन्हा ज़रा मेरे आने का रस्ता न देखा कहाँ नक़्श-ए-अव्वल कहाँ नक़्श-ए-सानी ख़ुदा की ख़ुदाई में तुझ सा न देखा तिरी याद है या है तेरा तसव्वुर कभी 'दाग़' को हम ने तन्हा न देखा

Dagh Dehlvi

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भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं किसी से आज बिगड़ी है कि वो यूँँ बन के बैठे हैं दिलों पर सैकड़ों सिक्के तिरे जोबन के बैठे हैं कलेजों पर हज़ारों तीर इस चितवन के बैठे हैं इलाही क्यूँँ नहीं उठती क़यामत माजरा क्या है हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं ये गुस्ताख़ी ये छेड़ अच्छी नहीं है ऐ दिल-ए-नादाँ अभी फिर रूठ जाएँगे अभी तो मन के बैठे हैं असर है जज़्ब-ए-उल्फ़त में तो खिंच कर आ ही जाएँगे हमें पर्वा नहीं हम से अगर वो तन के बैठे हैं सुबुक हो जाएँगे गर जाएँगे वो बज़्म-ए-दुश्मन में कि जब तक घर में बैठे हैं वो लाखों मन के बैठे हैं फ़ुसूँ है या दुआ है या मुअ'म्मा खुल नहीं सकता वो कुछ पढ़ते हुए आगे मिरे मदफ़न के बैठे हैं बहुत रोया हूँ मैं जब से ये मैं ने ख़्वाब देखा है कि आप आँसू बहाते सामने दुश्मन के बैठे हैं खड़े हों ज़ेर-ए-तूबा वो न दम लेने को दम भर भी जो हसरत-मंद तेरे साया-ए-दामन के बैठे हैं तलाश-ए-मंज़िल-ए-मक़्सद की गर्दिश उठ नहीं सकती कमर खोले हुए रस्ते में हम रहज़न के बैठे हैं ये जोश-ए-गिर्या तो देखो कि जब फ़ुर्क़त में रोया हूँ दर ओ दीवार इक पल में मिरे मदफ़न के बैठे हैं निगाह-ए-शोख़ ओ चश्म-ए-शौक़ में दर-पर्दा छनती है कि वो चिलमन में हैं नज़दीक हम चिलमन के बैठे हैं ये उठना बैठना महफ़िल में उन का रंग लाएगा क़यामत बन के उट्ठेंगे भबूका बन के बैठे हैं किसी की शामत आएगी किसी की जान जाएगी किसी की ताक में वो बाम पर बन-ठन के बैठे हैं क़सम दे कर उन्हें ये पूछ लो तुम रंग-ढंग उस के तुम्हारी बज़्म में कुछ दोस्त भी दुश्मन के बैठे हैं कोई छींटा पड़े तो 'दाग़' कलकत्ते चले जाएँ अज़ीमाबाद में हम मुंतज़िर सावन के बैठे हैं

Dagh Dehlvi

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रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी आप से तुम तुम से तू होने लगी चाहिए पैग़ाम-बर दोनों तरफ़ लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू होने लगी मेरी रुस्वाई की नौबत आ गई उन की शोहरत कू-ब-कू होने लगी है तिरी तस्वीर कितनी बे-हिजाब हर किसी के रू-ब-रू होने लगी ग़ैर के होते भला ऐ शाम-ए-वस्ल क्यूँँ हमारे रू-ब-रू होने लगी ना-उम्मीदी बढ़ गई है इस क़दर आरज़ू की आरज़ू होने लगी अब के मिल कर देखिए क्या रंग हो फिर हमारी जुस्तुजू होने लगी 'दाग़' इतराए हुए फिरते हैं आज शायद उन की आबरू होने लगी

Dagh Dehlvi

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