ghazalKuch Alfaaz

ज़ख़्मों के नए फूल खिलाने के लिए आ फिर मौसम-ए-गुल याद दिलाने के लिए आ मस्ती लिए आँखों में बिखेरे हुए ज़ुल्फ़ें आ फिर मुझे दीवाना बनाने के लिए आ अब लुत्फ़ इसी में है मज़ा है तो इसी में आ ऐ मिरे महबूब सताने के लिए आ आ रख दहन-ए-ज़ख़्म पे फिर उँगलियाँ अपनी दिल बाँसुरी तेरी है बजाने के लिए आ हाँ कुछ भी तो देरीना मोहब्बत का भरम रख दिल से न आ दुनिया को दिखाने के लिए आ माना कि मिरे घर से अदावत ही तुझे है रहने को न आ आग लगाने के लिए आ प्यारे तिरी सूरत से भी अच्छी है जो तस्वीर मैं ने तुझे रक्खी है दिखाने के लिए, आ आशुफ़्ता कहे है कोई दीवाना कहे है मैं कौन हूँ दुनिया को बताने के लिए आ कुछ रोज़ से हम शहर में रुस्वा न हुए हैं आ फिर कोई इल्ज़ाम लगाने के लिए आ अब के जो वो आ जाए तो 'आजिज़' उसे ले कर महफ़िल में ग़ज़ल अपनी सुनाने के लिए आ

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है न है फ़िक्र-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ न ख़याल-ए-जाँ मुझे फिर ये कैसा मलाल है ये सवाल है वो सवाल जिस का जवाब है मेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है मैं बिछड़ के तुझ सेे बुलंदियों पे जो पस्त हूँ ये उरूज है कि ज़वाल है ये सवाल है

Abbas Qamar

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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मेरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुंचे मुझे डर ये है बुराई तेरे नाम तक न पहुंचे मेरे पास क्या वो आते मेरा दर्द क्या मिटाते मेरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुंचे हो किसी का मुझ पे एहसांये नहीं पसंद मुझ को तेरी सुब्ह की तजल्ली मेरी शाम तक न पहुंचे तेरी बेरुख़ी पे ज़ालिम मेरा जी ये चाहता है कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुंचे मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मोतरिफ़ नहीं हूँ वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुंचे वो सनम बिगड़ के मुझ से मेरा क्या बिगाड़ लेगा कभी राज़ खोल दूँ मैं तो सलाम तक न पहुंचे मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं जो निकल के आशियांसे कभी दाम तक न पहुंचे उन्हें मेहरबांसमझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुंचे हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुंचे जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी मेरा ज़िक्र तक न आए मेरा नाम तक न पहुंचे तुम्हें याद ही न आऊंये है और बात वर्ना मैं नहीं हूंदूर इतना कि सलाम तक न पहुंचे

Kaleem Aajiz

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शाने का बहुत ख़ून-ए-जिगर जाए है प्यारे तब ज़ुल्फ़ कहीं ता-ब-कमर जाए है प्यारे जिस दिन कोई ग़म मुझ पे गुज़र जाए है प्यारे चेहरा तिरा उस रोज़ निखर जाए है प्यारे इक घर भी सलामत नहीं अब शहर-ए-वफ़ा में तू आग लगाने को किधर जाए है प्यारे रहने दे जफ़ाओं की कड़ी धूप में मुझ को साए में तो हर शख़्स ठहर जाए है प्यारे वो बात ज़रा सी जिसे कहते हैं ग़म-ए-दिल समझाने में इक उम्र गुज़र जाए है प्यारे हर-चंद कोई नाम नहीं मेरी ग़ज़ल में तेरी ही तरफ़ सब की नज़र जाए प्यारे

Kaleem Aajiz

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धड़कता जाता है दिल मुस्कुराने वालों का उठा नहीं है अभी ए'तिबार नालों का ये मुख़्तसर सी है रूदाद-ए-सुब्ह-ए-मय-ख़ाना ज़मीं पे ढेर था टूटे हुए पियालों का ये ख़ौफ़ है कि सबा लड़खड़ा के गिर न पड़े पयाम ले के चली है शिकस्ता-हालों का न आएँ अहल-ए-ख़िरद वादी-ए-जुनूँ की तरफ़ यहाँ गुज़र नहीं दामन बचाने वालों का लिपट लिपट के गले मिल रहे थे ख़ंजर से बड़े ग़ज़ब का कलेजा था मरने वालों का

Kaleem Aajiz

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मुँह फ़क़ीरों से न फेरा चाहिए ये तो पूछा चाहिए क्या चाहिए चाह का मेआ'र ऊँचा चाहिए जो न चाहें उन को चाहा चाहिए कौन चाहे है किसी को बे-ग़रज़ चाहने वालों से भागा चाहिए हम तो कुछ चाहे हैं तुम चाहो हो कुछ वक़्त क्या चाहे है देखा चाहिए चाहते हैं तेरे ही दामन की ख़ैर हम हैं दीवाने हमें क्या चाहिए बे-रुख़ी भी नाज़ भी अंदाज़ भी चाहिए लेकिन न इतना चाहिए हम जो कहना चाहते हैं क्या कहें आप कह लीजे जो कहना चाहिए बात चाहे बे-सलीक़ा हो 'कलीम' बात कहने का सलीक़ा चाहिए

Kaleem Aajiz

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हर चोट पे पूछे है बता याद रहेगी हम को ये ज़माने की अदा याद रहेगी दिन रात के आँसू सहर ओ शाम की आहें इस बाग़ की ये आब-ओ-हवा याद रहेगी किस धूम से बढ़ती हुई पहुँची है कहाँ तक दुनिया को तिरी ज़ुल्फ़-ए-रसा याद रहेगी करते रहेंगे तुम से मोहब्बत भी वफ़ा भी गो तुम को मोहब्बत न वफ़ा याद रहेगी किस बात का तू क़ौल-ओ-क़सम ले है बरहमन हर बात बुतों की ब-ख़ुदा याद रहेगी चलते गए हम फूल बनाते गए छाले सहरा को मिरी लग़्ज़िश-ए-पा याद रहेगी जिस बज़्म में तुम जाओगे उस बज़्म को 'आजिज़' ये गुफ़्तुगू-ए-बे-सर-ओ-पा याद रहेगी

Kaleem Aajiz

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