ghazalKuch Alfaaz

ज़िंदगी आज ये किस मोड़ पे ले आई है भीड़ नज़रों में है एहसास में तन्हाई है ये अलग बात कि अंजान नज़र आई है ज़ीस्त से वैसे तो बरसों की शनासाई है जैसे आता हो दबे पाँव कोई पास मिरे इस तरह दिल के धड़कने की सदा आई है ये ख़ुशी और ये ग़म है ये फ़ुग़ाँ है ये ज़ब्त ज़िंदगी सोच ले जिस में तिरी अच्छाई है एक दुनिया कि हमारे लिए बेचैन मगर एक वो शख़्स कि ख़ामोश तमाशाई है आप शोहरत की बुलंदी से उतर कर देखें आप के क़दमों से लिपटी हुई रुस्वाई है क्यूँ न अश'आर में हो कैफ़ वही मेरे 'नसीब' मय जलीली है तो साग़र मिरा मीनाई है

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