ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना पाँव बख़्शें हैं तो तौफ़ीक़-ए-सफ़र भी देना गुफ़्तुगू तू ने सिखाई है कि मैं गूँगा था अब मैं बोलूँगा तो बातों में असर भी देना मैं तो इस ख़ाना-बदोशी में भी ख़ुश हूँ लेकिन अगली नस्लें तो न भटकें उन्हें घर भी देना ज़ुल्म और सब्र का ये खेल मुकम्मल हो जाए उस को ख़ंजर जो दिया है मुझे सर भी देना
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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मुझ ऐसे शख़्स से रिश्ता नहीं निकाल सका वो अपने हुस्न का सदक़ा नहीं निकाल सका मैं मिल रहा था उसे बा'द एक मुद्दत के सो उस सेे कोई भी रिश्ता नहीं निकाल सका तेरे लिए तो मुझे ज़िंदगी भी कम थी मगर मेरे लिए तो तू लम्हा नहीं निकाल सका तू देख पाई नहीं मुझ को ख़त्म होते हुए मैं तेरी आँख का कचरा नहीं निकाल सका इक ऐसी बात का ग़ुस्सा है मेरे लहजे में वो बात जिस का मैं ग़ुस्सा नहीं निकाल सका
Vikram Gaur Vairagi
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इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँँ सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता जीते-जी जब से मर गया हूँ मैं अब है बस अपना सामना दर-पेश हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं वही नाज़-ओ-अदा वही ग़म्ज़े सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाया जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं तुम से जानाँ मिला हूँ जिस दिन से बे-तरह ख़ुद से डर गया हूँ मैं कू-ए-जानाँ में सोग बरपा है कि अचानक सुधर गया हूँ मैं
Jaun Elia
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तुम्हारा क्या है तुम्हें सिर्फ़ ज्ञान देना है हमारी सोचो हमें इम्तिहान देना है गुलाब भी हैं गुलाबों में ख़ार भी हैं बता निशानी देनी है या फिर निशान देना है तेरा सवाल मेरी जान का सवाल है और जवाब देने से आसान जान देना है उन्होंने अपने मुताबिक़ सज़ा सुना दी है हमें सज़ा के मुताबिक़ बयान देना है ये बेज़ुबानों की महफ़िल है दोस्त याद रहे यहाँ ख़मोशी का मतलब ज़बान देना है
Charagh Sharma
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तेरे बारे में जब सोचा नहीं था मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था तेरी तस्वीर से करता था बातें मेरे कमरे में आईना नहीं था समुंदर ने मुझे प्यासा ही रक्खा मैं जब सहरा में था प्यासा नहीं था मनाने रूठने के खेल में हम बिछड़ जाएँगे ये सोचा नहीं था सुना है बंद कर लीं उस ने आँखें कई रातों से वो सोया नहीं था
Meraj Faizabadi
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किसी की मर्ज़ी को अपनी क़िस्मत बना चुके हैं हम अपने हाथों की सब लकीरें मिटा चुके हैं चलो समुंदर की वुसअतों में सुकून ढूँढ़े कि साहिलों पर बहुत घरौंदें बना चुके हैं उन्हीं छतों से हमारे आँगन में मौत बरसी वही छतें जिन से हम पतंगें उड़ा चुके हैं
Meraj Faizabadi
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