ज़िंदगी से यही गिला है मुझे तू बहुत देर से मिला है मुझे तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल हार जाने का हौसला है मुझे दिल धड़कता नहीं टपकता है कल जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे कोहकन हो कि क़ैस हो कि 'फ़राज़' सब में इक शख़्स ही मिला है मुझे
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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वहशतें बढ़ती गईं हिज्र के आज़ार के साथ अब तो हम बात भी करते नहीं ग़म-ख़्वार के साथ हम ने इक उम्र बसर की है ग़म-ए-यार के साथ 'मीर' दो दिन न जिए हिज्र के आज़ार के साथ अब तो हम घर से निकलते हैं तो रख देते हैं ताक़ पर इज़्ज़त-ए-सादात भी दस्तार के साथ इस क़दर ख़ौफ़ है अब शहर की गलियों में कि लोग चाप सुनते हैं तो लग जाते हैं दीवार के साथ एक तो ख़्वाब लिए फिरते हो गलियों गलियों उस पे तकरार भी करते हो ख़रीदार के साथ शहर का शहर ही नासेह हो तो क्या कीजिएगा वर्ना हम रिंद तो भिड़ जाते हैं दो-चार के साथ हम को उस शहर में ता'मीर का सौदा है जहाँ लोग में'मार को चुन देते हैं दीवार के साथ जो शरफ़ हम को मिला कूचा-ए-जानाँ से 'फ़राज़' सू-ए-मक़्तल भी गए हैं उसी पिंदार के साथ
Ahmad Faraz
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दिल बदन का शरीक-ए-हाल कहाँ हिज्र फिर हिज्र है विसाल कहाँ इश्क़ है नाम इंतिहाओं का इस समुंदर में एतिदाल कहाँ ऐसा नशातो ज़हर में भी न था ऐ ग़म-ए-दिल तिरी मिसाल कहाँ हम को भी अपनी पाएमाली का है मगर इस क़दर मलाल कहा मैं नई दोस्ती के मोड़ पे था आ गया है तिरा ख़याल कहा दिल कि ख़ुश-फ़हम था सो है वर्ना तेरे मिलने का एहतिमाल कहाँ वस्ल ओ हिज्रांहैं और दुनियाएं इन ज़मानों में माह-ओ-साल कहाँ तुझ को देखा तो लोग हैरांहैं आ गया शहर में ग़ज़ाल कहाँ तुझ पे लिक्खी तो सज गई है ग़ज़ल आ मिला ख़्वाब से ख़याल कहाँ अब तो शह मात हो रही है 'फ़राज़' अब बचाव की कोई चाल कहाँ
Ahmad Faraz
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करूँँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे ग़ज़ल बहाना करूँँ और गुनगुनाऊँ उसे वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे ये लोग तज़्किरे करते हैं अपने लोगों के मैं कैसे बात करूँँ अब कहाँ से लाऊँ उसे मगर वो ज़ूद-फ़रामोश ज़ूद-रंज भी है कि रूठ जाए अगर याद कुछ दिलाऊँ उसे वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ तुम्हारी बात पे ऐ नासेहो गँवाऊँ उसे जो हम-सफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है 'फ़राज़' अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे
Ahmad Faraz
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उस का अपना ही करिश्मा है फ़ुसूँ है यूँँ है यूँँ तो कहने को सभी कहते हैं यूँँ है यूँँ है जैसे कोई दर-ए-दिल पर हो सितादा कब से एक साया न दरूँ है न बरूँ है यूँँ है तुम ने देखी ही नहीं दश्त-ए-वफ़ा की तस्वीर नोक-ए-हर-ख़ार पे इक क़तरा-ए-ख़ूँ है यूँँ है तुम मोहब्बत में कहाँ सूद-ओ-ज़ियाँ ले आए इश्क़ का नाम ख़िरद है न जुनूँ है यूँँ है अब तुम आए हो मिरी जान तमाशा करने अब तो दरिया में तलातुम न सुकूँ है यूँँ है नासेहा तुझ को ख़बर क्या कि मोहब्बत क्या है रोज़ आ जाता है समझाता है यूँँ है यूँँ है शाइ'री ताज़ा ज़मानों की है में'मार 'फ़राज़' ये भी इक सिलसिला-ए-कुन-फ़यकूँ है यूँँ है
Ahmad Faraz
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जिस से ये तबीअत बड़ी मुश्किल से लगी थी देखा तो वो तस्वीर हर इक दिल से लगी थी तन्हाई में रोते हैं कि यूँँ दिल को सुकूँ हो ये चोट किसी साहिब-ए-महफ़िल से लगी थी ऐ दिल तिरे आशोब ने फिर हश्र जगाया बे-दर्द अभी आँख भी मुश्किल से लगी थी ख़िल्क़त का अजब हाल था उस कू-ए-सितम में साए की तरह दामन-ए-क़ातिल से लगी थी उतरा भी तो कब दर्द का चढ़ता हुआ दरिया जब कश्ती-ए-जाँ मौत के साहिल से लगी थी
Ahmad Faraz
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