"आख़िरी बार मिलो" आख़िरी बार मिलो ऐसे कि जलते हुए दिल राख हो जाएँ कोई और तक़ाज़ा न करें चाक-ए-वादा न सिले ज़ख़्म-ए-तमन्ना न खिले साँस हमवार रहे शम्अ' की लौ तक न हिले बातें बस इतनी कि लम्हे उन्हें आ कर गिन जाएँ आँख उठाए कोई उम्मीद तो आँखें छिन जाएँ इस मुलाक़ात का इस बार कोई वहम नहीं जिस से इक और मुलाक़ात की सूरत निकले अब न हैजान ओ जुनूँ का न हिकायात का वक़्त अब न तजदीद-ए-वफ़ा का न शिकायात का वक़्त लुट गई शहर-ए-हवादिस में मता-ए-अल्फ़ाज़ अब जो कहना है तो कैसे कोई नौहा कहिए आज तक तुम से रग-ए-जाँ के कई रिश्ते थे कल से जो होगा उसे कौन सा रिश्ता कहिए फिर न दहकेंगे कभी आरिज़-ओ-रुख़्सार मिलो मातमी हैं दम-ए-रुख़्सत दर-ओ-दीवार मिलो फिर न हम होंगे न इक़रार न इनकार मिलो आख़िरी बार मिलो
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना
Rishabh Sharma
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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