हमारे मकानों से ऊपर से कूजें जुनूबी इलाक़े से आती हुई चाँद तारा बनाती हुई आज गुज़रेंगी उन के गुज़रने मसाफ़त में रू-पोश होने से हम जान लेंगे कड़ाके की सर्दी गई है बहार आ रही है यूँँही गोद माँ की लड़कपन जवानी बुढ़ापा बहार आ रही है इन्ही रुख़ बदलते हुए राह जाते हुए क़ाफ़िलों को कोई मेरी जानिब से इतना कहे आने-जाने के फैले हुए क़ाफ़िले पर कहाँ सर्द मौसम रुकेगा कहाँ किस तरफ़ से बहार आएगी सब्ज़ा किन रास्तों पर उगेगा जवानी बुढ़ापा लड़कपन ज़मीं और माँ रफ़्त के बा'द आमद कहाँ है
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"मैं और तुम" हम दोनों मुस्तकबिल में एक होना चाहते थे मैं इस ख़याल से डरती थी और वो दुआ माँगते थे वो मुझे हर घड़ी और मोड़ पे सँभालता था मगर दोनों डरते थे क्योंकि दोनों अलग मज़हब से थे इश्क़ में इतनी पाबंदी है क्यूँ मैं इसी सोच में रोया करती थी आँख से आँसू बहते थे तकिए को भिगोया करती थी और वो भी इसी सोच में परेशान था मैं हिंदू थी और वो मुसलमान था साथ होकर कभी अलग होंगे यार फिर साथ में ग़लत होंगे डाँटती थी उसे बराबर दिन और वो चुप मुझे अजब होंगे उस के घर वाले मान जाते लेकिन मेरा घर मुझे मार देता मैं अगर उस की नहीं होती एक दिन वो ख़ुद को हार देता इस लिए हम दोनों एक अच्छी नौकरी चाहते थे नौकरी होगी तो सब मान आई जाएँगे ये हम मानते थे लेकिन हमें पता नहीं था हमारे साथ आगे क्या होगा या फिर हम उस के रहेंगे भी या वो मुझ सेे जुदा होगा दोनों डरते थे समाज के है एक इंसान से लोग कहते थे धोखा मिलता है मुसलमान से हम एक दूजे को अच्छे से समझते थे लेकिन सारा जमाना हमारे ख़यालों से अनजान था फ़र्क़ इतना था बस मैं हिंदू थी और वो मुसलमान था
Arohi Tripathi
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"बाबा" तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा दिल से अब बस यही दुआ निकलती है हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा
ALI ZUHRI
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"कब तक ख़ैर मनाते हम" उल्फ़त के कूचों से साबित कैसे बचकर आते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम बड़ी बड़ी बातें कर दी थीं उन पर जान लुटाएंगे हुक़्म करें वो, आसमान से तारे भी ले आएँगे पर क़िस्मत और क़ुदरत इक थाली के चट्टे बट्टे थे कोशिश अपनी पूरी रहती पर अंगूर तो खट्टे थे बिगड़ा स्वाद जो उन के मुँह का उन को चटनी खानी थी बेचारा दिल, बेवकूफ़ था कुछ अपनी नादानी थी अदने से दिल की ख़ातिर क्या मूसल से डर जाते हम? हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम हम ने पूरी जुगत लगाई मगर सफलता ना मिल पाई फिर हम ने उम्मीद छोड़ दी ख़ुदस छेड़ी एक लड़ाई अब बातों में ना आएँगे उन जैसे ही बन जाएँगे उन की जानिब ना देखेंगे नाम 'नयनसुख' कह लाएँगे लेकिन हम थे सावन वाले और ऊपर से दिल के छाले छोड़ रेवड़ी उन की ख़ातिर हम ने रूखी सूखी खाई ऊँट सो गया उलटी करवट जमके ली उस ने जम्हाई पड़ते ओलों में अब देखो अपना सर मुंडवाते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम इधर प्रिये मधु है, और हम हैं तुम उस पार नज़र आते हो कैसे बीन बजाएँ हिय की तुम तो ऐसे पगुराते हो कान पे जूँ रेंगाने ख़ातिर हम प्रयत्न करते रहते हैं तिस पर तुम क्रोधित होते हो हम तुम सेे डरते रहते हैं ख़ैर, हुआ सो बिसरा देते तुम थोड़ा सा इतरा लेते हम थोड़ी मनुहार लगाकर कोप तुम्हारा छितरा देते किन्तु अतिप्रिय तुम्हें क्रोध था और ना इस का कोई बोध था हम सेे तुम कटते जाते थे यथा दुग्ध, फटते जाते थे इतने फटे हुए में कैसे अपनी टांग अड़ाते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??
Shadab Javed
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"ताबीरों की लाश" हम ने भी कुछ ख़्वाब बुने थे ख़्वाब हमारे गिने चुने थे ख़्वाबों में कब मैं होता था तुम होते थे ख़्वाबों में जब भी होते थे हम होते थे ख़्वाबों में आँगन देखा था प्यारा सा सावन देखा था ताबीरों पर बात हुई थी देखो किचन की बाईं जानिब शिव जी का मंदिर रखना है मैं ने शायद मना किया था रूठ गई थी झगड़ पड़ी थी ख़ूब लड़ी थी तुम्हें पता है जिस कमरे में मैं रहता हूँ वो कमरा अब भरा पड़ा है ख़्वाब तो ज़ाया' हो जाते हैं ताबीरों की लाश पड़ी है
Anand Raj Singh
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तिरे दरख़्तों की टहनियों पर बहार उतरे तिरी गुज़रगाहें नेक राहों की मंज़िलें हों मिरा ज़माना नए नए मौसमों की ख़ुश्बू तिरे शब-ओ-रोज़ की महक हो ज़मीन पर जब भी रात फैले किरन जो ज़ुल्मत को रौशनी दे तिरी किरन हो परिंदे उड़ते हुए परिंदे हज़ार सम्तों से तेरे बाग़ों में चहचहाएँ वो रात जिस की सहर नहीं है वो तेरे शहरों से तेरे क़स्बों से दूर गुज़रे वो हाथ जो अज़्मतों के हिज्जे मिटा रहा है वो हाथ लौह-ओ-क़लम के शजरे से टूट जाए कलस पे लफ़्ज़ों के फूल बरसें तिरी फ़सीलों के बुर्ज दुनिया में जगमगाएँ अकेले-पन की सज़ा में दिन काटते हज़ारों तिरी ज़ियारत-गहों की बख़्शिश से ताज़ा-दम हों तिरे मुक़द्दर की बादशाहत ज़मीं पे निखरे नए ज़माने की इब्तिदा तेरे नाम से हो ख़ुशी के चेहरे पे वस्ल का अब्र तैर जाए तमाम दुनिया में तज़्किरे तेरे फैल जाएँ
Jelani Kamran
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कौन से बाग़ में जा कर हो आए दिल की हर बात सुना कर हो आए! एक साअत को जहाँ देखा कई चेहरे थे ख़ुश-नुमा बज़्म में हर एक तरफ़ फूल के अध-खिलते हुए सहरे थे इक अजब आब-ओ-हवा बिखरी थी जिस के चलने से सहर और बहुत निखरी थी मैं ने हर सम्त कहा मैं हूँ! ये तुम हो? तू है? ऐसे आलम में ये क्या ख़ुशबू है? इक अजब वक़्त रहा दीद का देखा पाया महफ़िल-ए-राह में जिस जिस को ज़मीं पर देखा उस को इस बाग़ में चलते पाया
Jelani Kamran
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दिन आया न मल्बूस बदल के न निखर के और लोग भी निकले न शगुफ़्ता न चमकदार तब मैं ने सोचा मिरे काग़ज़ के ग़ुब्बारे न नाचें तो बेहतर है इक उम्र का सदमा है बहुत तल्ख़ ज़मीं को न सालगिरह आज मनाऊँ मैं तो बेहतर वो भी नहीं ख़ुश और न ख़ुश दिन का गुज़र है ऐ उम्र तिरा सख़्त अकेले का सफ़र है तब मैं ने कहा चाँद अगर अपने बदन को औरत का बदन दे तो मैं काँटों के तराज़ू दिल दे के बदल लूँ दिल दे के बदल लूँ मैं क़यामत भी गहन भी और उन के एवज़ उस से कहूँ आज के दिन तो रुक मेरी ज़मीं पर तक़दीर हवा बन के दरख़्तों में खड़ी है और मैं ऐ अजब चीज़ चटानों पे गिरा हूँ
Jelani Kamran
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मेरे हाथ पे लिक्खा क्या है उम्र के ऊपर बर्क़ का गहरा साया क्या है कौन ख़फ़ा है राह का बूढ़ा पेड़ झुका है चिड़ियाँ हैं चुप-चाप आती जाती रुत के बदले गर्द की गहरी छाप गर्द के पीछे आने वाले दौर की धीमी थाप रस्ता क्या है मंज़िल क्या है मेरे साथ सफ़र पर आते-जाते लोगों महशर क्या है माज़ी हाल का बदला बदला मंज़र क्या है मैं और तू क्या चीज़ हैं तिनके पत्ते एक निशान अक्स के अंदर टुकड़े टुकड़े ज़ाहिर में इंसान कब के ढूँड रहे हैं हम सब अपना नख़लिस्तान नाक़ा क्या है महमिल क्या है शहर से आते-जाते लोगों देखो राह से कौन गया है जलते काग़ज़ की ख़ुश्बू में ग़र्क़ फ़ज़ा है चारों सम्त से लोग बढ़े हैं ऊँचे शहर के पास आज अँधेरी रात में अपना कौन है राह-शनास ख़्वाब की हर ता'बीर में गुम है अच्छी शय की आस दिन क्या शय है साया क्या है घटते-बढ़ते चाँद के अंदर दुनिया क्या है फ़र्श पे गिर कर दिल का शीशा टूट गया है
Jelani Kamran
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कल रात वो आसमानों से उतरा बहुत ख़ुश हुआ बहुत ख़ुश हुआ जैसे गहरे समुंदर ग़ज़बनाकियों में उछलते हैं या आसमाँ पर फ़रिश्ते क़ुबूल-ए-इबादत पे मसरूर होते हैं उस ने कहा मैं ने जो कुछ कहा था वो पूरा हुआ जो मैं देखता था वो मैं देखता था जो वो देखता था वो शीशे में ख़ुद उस का अपना ही चेहरा था ज़ाहिर न मख़्फ़ी न वाज़ेह फ़क़त एक मुमकिन कि होता न होता उस ने ये देख कर अपनी हर कामयाबी की फ़िहरिस्त तरतीब दी और आख़िर में लिक्खा ज़मीन पर ख़ुदा की तवक़्क़ो न पूरी हुई थी न पूरी हुई है जिसे हम ने आदम कहा था वो मिट्टी का बे-कार बे-अस्ल धोका था धोका ही साबित हुआ उस से कुछ न हुआ फ़ज़ाओं में नीली हवाओं में दोज़ख़ में जन्नत में अक़्वाम-ए-आलम की महफ़िल-सराओं में उस बे-नवा का तमस्ख़ुर उड़ा जिसे मैं ने बर-वक़्त रोका था
Jelani Kamran
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