कल रात वो आसमानों से उतरा बहुत ख़ुश हुआ बहुत ख़ुश हुआ जैसे गहरे समुंदर ग़ज़बनाकियों में उछलते हैं या आसमाँ पर फ़रिश्ते क़ुबूल-ए-इबादत पे मसरूर होते हैं उस ने कहा मैं ने जो कुछ कहा था वो पूरा हुआ जो मैं देखता था वो मैं देखता था जो वो देखता था वो शीशे में ख़ुद उस का अपना ही चेहरा था ज़ाहिर न मख़्फ़ी न वाज़ेह फ़क़त एक मुमकिन कि होता न होता उस ने ये देख कर अपनी हर कामयाबी की फ़िहरिस्त तरतीब दी और आख़िर में लिक्खा ज़मीन पर ख़ुदा की तवक़्क़ो न पूरी हुई थी न पूरी हुई है जिसे हम ने आदम कहा था वो मिट्टी का बे-कार बे-अस्ल धोका था धोका ही साबित हुआ उस से कुछ न हुआ फ़ज़ाओं में नीली हवाओं में दोज़ख़ में जन्नत में अक़्वाम-ए-आलम की महफ़िल-सराओं में उस बे-नवा का तमस्ख़ुर उड़ा जिसे मैं ने बर-वक़्त रोका था
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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तिरे दरख़्तों की टहनियों पर बहार उतरे तिरी गुज़रगाहें नेक राहों की मंज़िलें हों मिरा ज़माना नए नए मौसमों की ख़ुश्बू तिरे शब-ओ-रोज़ की महक हो ज़मीन पर जब भी रात फैले किरन जो ज़ुल्मत को रौशनी दे तिरी किरन हो परिंदे उड़ते हुए परिंदे हज़ार सम्तों से तेरे बाग़ों में चहचहाएँ वो रात जिस की सहर नहीं है वो तेरे शहरों से तेरे क़स्बों से दूर गुज़रे वो हाथ जो अज़्मतों के हिज्जे मिटा रहा है वो हाथ लौह-ओ-क़लम के शजरे से टूट जाए कलस पे लफ़्ज़ों के फूल बरसें तिरी फ़सीलों के बुर्ज दुनिया में जगमगाएँ अकेले-पन की सज़ा में दिन काटते हज़ारों तिरी ज़ियारत-गहों की बख़्शिश से ताज़ा-दम हों तिरे मुक़द्दर की बादशाहत ज़मीं पे निखरे नए ज़माने की इब्तिदा तेरे नाम से हो ख़ुशी के चेहरे पे वस्ल का अब्र तैर जाए तमाम दुनिया में तज़्किरे तेरे फैल जाएँ
Jelani Kamran
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कौन से बाग़ में जा कर हो आए दिल की हर बात सुना कर हो आए! एक साअत को जहाँ देखा कई चेहरे थे ख़ुश-नुमा बज़्म में हर एक तरफ़ फूल के अध-खिलते हुए सहरे थे इक अजब आब-ओ-हवा बिखरी थी जिस के चलने से सहर और बहुत निखरी थी मैं ने हर सम्त कहा मैं हूँ! ये तुम हो? तू है? ऐसे आलम में ये क्या ख़ुशबू है? इक अजब वक़्त रहा दीद का देखा पाया महफ़िल-ए-राह में जिस जिस को ज़मीं पर देखा उस को इस बाग़ में चलते पाया
Jelani Kamran
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दिन आया न मल्बूस बदल के न निखर के और लोग भी निकले न शगुफ़्ता न चमकदार तब मैं ने सोचा मिरे काग़ज़ के ग़ुब्बारे न नाचें तो बेहतर है इक उम्र का सदमा है बहुत तल्ख़ ज़मीं को न सालगिरह आज मनाऊँ मैं तो बेहतर वो भी नहीं ख़ुश और न ख़ुश दिन का गुज़र है ऐ उम्र तिरा सख़्त अकेले का सफ़र है तब मैं ने कहा चाँद अगर अपने बदन को औरत का बदन दे तो मैं काँटों के तराज़ू दिल दे के बदल लूँ दिल दे के बदल लूँ मैं क़यामत भी गहन भी और उन के एवज़ उस से कहूँ आज के दिन तो रुक मेरी ज़मीं पर तक़दीर हवा बन के दरख़्तों में खड़ी है और मैं ऐ अजब चीज़ चटानों पे गिरा हूँ
Jelani Kamran
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मेरे हाथ पे लिक्खा क्या है उम्र के ऊपर बर्क़ का गहरा साया क्या है कौन ख़फ़ा है राह का बूढ़ा पेड़ झुका है चिड़ियाँ हैं चुप-चाप आती जाती रुत के बदले गर्द की गहरी छाप गर्द के पीछे आने वाले दौर की धीमी थाप रस्ता क्या है मंज़िल क्या है मेरे साथ सफ़र पर आते-जाते लोगों महशर क्या है माज़ी हाल का बदला बदला मंज़र क्या है मैं और तू क्या चीज़ हैं तिनके पत्ते एक निशान अक्स के अंदर टुकड़े टुकड़े ज़ाहिर में इंसान कब के ढूँड रहे हैं हम सब अपना नख़लिस्तान नाक़ा क्या है महमिल क्या है शहर से आते-जाते लोगों देखो राह से कौन गया है जलते काग़ज़ की ख़ुश्बू में ग़र्क़ फ़ज़ा है चारों सम्त से लोग बढ़े हैं ऊँचे शहर के पास आज अँधेरी रात में अपना कौन है राह-शनास ख़्वाब की हर ता'बीर में गुम है अच्छी शय की आस दिन क्या शय है साया क्या है घटते-बढ़ते चाँद के अंदर दुनिया क्या है फ़र्श पे गिर कर दिल का शीशा टूट गया है
Jelani Kamran
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हमारे मकानों से ऊपर से कूजें जुनूबी इलाक़े से आती हुई चाँद तारा बनाती हुई आज गुज़रेंगी उन के गुज़रने मसाफ़त में रू-पोश होने से हम जान लेंगे कड़ाके की सर्दी गई है बहार आ रही है यूँँही गोद माँ की लड़कपन जवानी बुढ़ापा बहार आ रही है इन्ही रुख़ बदलते हुए राह जाते हुए क़ाफ़िलों को कोई मेरी जानिब से इतना कहे आने-जाने के फैले हुए क़ाफ़िले पर कहाँ सर्द मौसम रुकेगा कहाँ किस तरफ़ से बहार आएगी सब्ज़ा किन रास्तों पर उगेगा जवानी बुढ़ापा लड़कपन ज़मीं और माँ रफ़्त के बा'द आमद कहाँ है
Jelani Kamran
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