nazmKuch Alfaaz

मेरे हाथ पे लिक्खा क्या है उम्र के ऊपर बर्क़ का गहरा साया क्या है कौन ख़फ़ा है राह का बूढ़ा पेड़ झुका है चिड़ियाँ हैं चुप-चाप आती जाती रुत के बदले गर्द की गहरी छाप गर्द के पीछे आने वाले दौर की धीमी थाप रस्ता क्या है मंज़िल क्या है मेरे साथ सफ़र पर आते-जाते लोगों महशर क्या है माज़ी हाल का बदला बदला मंज़र क्या है मैं और तू क्या चीज़ हैं तिनके पत्ते एक निशान अक्स के अंदर टुकड़े टुकड़े ज़ाहिर में इंसान कब के ढूँड रहे हैं हम सब अपना नख़लिस्तान नाक़ा क्या है महमिल क्या है शहर से आते-जाते लोगों देखो राह से कौन गया है जलते काग़ज़ की ख़ुश्बू में ग़र्क़ फ़ज़ा है चारों सम्त से लोग बढ़े हैं ऊँचे शहर के पास आज अँधेरी रात में अपना कौन है राह-शनास ख़्वाब की हर ता'बीर में गुम है अच्छी शय की आस दिन क्या शय है साया क्या है घटते-बढ़ते चाँद के अंदर दुनिया क्या है फ़र्श पे गिर कर दिल का शीशा टूट गया है

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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कौन से बाग़ में जा कर हो आए दिल की हर बात सुना कर हो आए! एक साअत को जहाँ देखा कई चेहरे थे ख़ुश-नुमा बज़्म में हर एक तरफ़ फूल के अध-खिलते हुए सहरे थे इक अजब आब-ओ-हवा बिखरी थी जिस के चलने से सहर और बहुत निखरी थी मैं ने हर सम्त कहा मैं हूँ! ये तुम हो? तू है? ऐसे आलम में ये क्या ख़ुशबू है? इक अजब वक़्त रहा दीद का देखा पाया महफ़िल-ए-राह में जिस जिस को ज़मीं पर देखा उस को इस बाग़ में चलते पाया

Jelani Kamran

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तिरे दरख़्तों की टहनियों पर बहार उतरे तिरी गुज़रगाहें नेक राहों की मंज़िलें हों मिरा ज़माना नए नए मौसमों की ख़ुश्बू तिरे शब-ओ-रोज़ की महक हो ज़मीन पर जब भी रात फैले किरन जो ज़ुल्मत को रौशनी दे तिरी किरन हो परिंदे उड़ते हुए परिंदे हज़ार सम्तों से तेरे बाग़ों में चहचहाएँ वो रात जिस की सहर नहीं है वो तेरे शहरों से तेरे क़स्बों से दूर गुज़रे वो हाथ जो अज़्मतों के हिज्जे मिटा रहा है वो हाथ लौह-ओ-क़लम के शजरे से टूट जाए कलस पे लफ़्ज़ों के फूल बरसें तिरी फ़सीलों के बुर्ज दुनिया में जगमगाएँ अकेले-पन की सज़ा में दिन काटते हज़ारों तिरी ज़ियारत-गहों की बख़्शिश से ताज़ा-दम हों तिरे मुक़द्दर की बादशाहत ज़मीं पे निखरे नए ज़माने की इब्तिदा तेरे नाम से हो ख़ुशी के चेहरे पे वस्ल का अब्र तैर जाए तमाम दुनिया में तज़्किरे तेरे फैल जाएँ

Jelani Kamran

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दिन आया न मल्बूस बदल के न निखर के और लोग भी निकले न शगुफ़्ता न चमकदार तब मैं ने सोचा मिरे काग़ज़ के ग़ुब्बारे न नाचें तो बेहतर है इक उम्र का सदमा है बहुत तल्ख़ ज़मीं को न सालगिरह आज मनाऊँ मैं तो बेहतर वो भी नहीं ख़ुश और न ख़ुश दिन का गुज़र है ऐ उम्र तिरा सख़्त अकेले का सफ़र है तब मैं ने कहा चाँद अगर अपने बदन को औरत का बदन दे तो मैं काँटों के तराज़ू दिल दे के बदल लूँ दिल दे के बदल लूँ मैं क़यामत भी गहन भी और उन के एवज़ उस से कहूँ आज के दिन तो रुक मेरी ज़मीं पर तक़दीर हवा बन के दरख़्तों में खड़ी है और मैं ऐ अजब चीज़ चटानों पे गिरा हूँ

Jelani Kamran

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कल रात वो आसमानों से उतरा बहुत ख़ुश हुआ बहुत ख़ुश हुआ जैसे गहरे समुंदर ग़ज़बनाकियों में उछलते हैं या आसमाँ पर फ़रिश्ते क़ुबूल-ए-इबादत पे मसरूर होते हैं उस ने कहा मैं ने जो कुछ कहा था वो पूरा हुआ जो मैं देखता था वो मैं देखता था जो वो देखता था वो शीशे में ख़ुद उस का अपना ही चेहरा था ज़ाहिर न मख़्फ़ी न वाज़ेह फ़क़त एक मुमकिन कि होता न होता उस ने ये देख कर अपनी हर कामयाबी की फ़िहरिस्त तरतीब दी और आख़िर में लिक्खा ज़मीन पर ख़ुदा की तवक़्क़ो न पूरी हुई थी न पूरी हुई है जिसे हम ने आदम कहा था वो मिट्टी का बे-कार बे-अस्ल धोका था धोका ही साबित हुआ उस से कुछ न हुआ फ़ज़ाओं में नीली हवाओं में दोज़ख़ में जन्नत में अक़्वाम-ए-आलम की महफ़िल-सराओं में उस बे-नवा का तमस्ख़ुर उड़ा जिसे मैं ने बर-वक़्त रोका था

Jelani Kamran

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हमारे मकानों से ऊपर से कूजें जुनूबी इलाक़े से आती हुई चाँद तारा बनाती हुई आज गुज़रेंगी उन के गुज़रने मसाफ़त में रू-पोश होने से हम जान लेंगे कड़ाके की सर्दी गई है बहार आ रही है यूँँही गोद माँ की लड़कपन जवानी बुढ़ापा बहार आ रही है इन्ही रुख़ बदलते हुए राह जाते हुए क़ाफ़िलों को कोई मेरी जानिब से इतना कहे आने-जाने के फैले हुए क़ाफ़िले पर कहाँ सर्द मौसम रुकेगा कहाँ किस तरफ़ से बहार आएगी सब्ज़ा किन रास्तों पर उगेगा जवानी बुढ़ापा लड़कपन ज़मीं और माँ रफ़्त के बा'द आमद कहाँ है

Jelani Kamran

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